
रिपोर्ट के अनुसार, इस नए कानून के तहत वेस्ट बैंक में सैन्य अदालतों द्वारा दोषी ठहराए गए आतंकियों के लिए मौत की सजा (फांसी) को डिफॉल्ट सजा बनाया गया है. यानी गंभीर आतंकी हमलों में दोषी पाए जाने पर फांसी प्राथमिक सजा होगी, हालांकि कुछ मामलों में उम्रकैद का विकल्प भी रखा गया है.
कानून में यह भी प्रावधान है कि सजा सुनाए जाने के बाद सीमित समय के भीतर फांसी दी जा सकती है. इस फैसले को प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की सरकार के सहयोगियों, खासकर दक्षिणपंथी नेताओं की बड़ी जीत माना जा रहा है.
हालांकि, इस कानून को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तीखी आलोचना हो रही है. मानवाधिकार संगठनों और कई देशों ने इसे भेदभावपूर्ण और अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ बताया है. आलोचकों का कहना है कि यह कानून मुख्य रूप से फिलिस्तीनियों को निशाना बनाता है और क्षेत्र में तनाव को और बढ़ा सकता है.
इज़रायल में पहले मौत की सजा बहुत ही दुर्लभ मामलों में लागू होती थी और आखिरी बार 1962 में फांसी दी गई थी.
यह नया कानून इज़रायल की सुरक्षा नीति में बड़ा बदलाव माना जा रहा है, लेकिन इसके कानूनी और राजनीतिक प्रभाव को लेकर विवाद अभी जारी है.
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