दिल्ली में द इंडियन एक्सप्रेस समूह द्वारा 27 मार्च 2026 को आयोजित रामनाथ गोयनका उत्कृष्ट पत्रकारिता पुरस्कारों के 20वें संस्करण में उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन शामिल हुए. इस दौरान उन्होंने पत्रकारों को संबोधित करते हुए कहा कि ये पुरस्कार केवल पेशेवर उपलब्धियों का सम्मान नहीं करते, बल्कि निडर और सिद्धांतनिष्ठ पत्रकारिता की स्थायी भावना का भी कीर्तिगान करते हैं.

उपराष्ट्रपति ने स्वतंत्रता संग्राम के योद्धा और द इंडियन एक्सप्रेस के संस्थापक श्री रामनाथ गोयनका की विरासत को याद किया. उन्होंने कहा कि गोयनका जी का जीवन साहस, स्वतंत्रता और सत्य के प्रति अटूट प्रतिबद्धता का प्रतीक है. ब्रिटिश शासन के दौरान भारत छोड़ो आंदोलन में उन्होंने सेंसरशिप के विरोध में अखबार बंद करने का साहसिक निर्णय लिया था. संविधान सभा के सदस्य के रूप में उन्होंने समाचार पत्रों पर कराधान जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपनी बात रखी.
आपातकाल के काले दिनों का जिक्र करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा, “श्री रामनाथ गोयनका ने खाली संपादकीय प्रकाशित करके मौन की शक्ति का अद्भुत प्रदर्शन किया.” संपादकों की गिरफ्तारी, बिजली आपूर्ति में बाधा, आर्थिक नुकसान और हर तरह के उत्पीड़न के बावजूद उन्होंने लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया. यह खाली संपादकीय प्रेस की स्वतंत्रता और नागरिकों के अधिकार का सशक्त प्रतीक बन गया. उन्होंने गोयनका जी के जीवन यात्रा को भी याद किया और कहा कि दरभंगा से चेन्नई तक का सफर और विदिशा से सांसद के रूप में उनका कार्यकाल भारत की विविधता में एकता को दर्शाता है. उन्होंने अंग्रेजी के अलावा कई क्षेत्रीय भाषाओं में समाचार पत्र प्रकाशित कर आम जनता तक पहुंच बनाई.
उपराष्ट्रपति ने जोर देकर कहा कि चर्चा, बहस और असहमति का उद्देश्य राष्ट्र हित में निर्णय लेना होना चाहिए, न कि व्यवधान पैदा करना. प्रधानमंत्री के औपनिवेशिक मानसिकता त्यागने के आह्वान को याद करते हुए उन्होंने कहा कि मीडिया संस्थानों को वैश्विक और राष्ट्रीय घटनाओं को भारतीय सभ्यतागत मूल्यों से जोड़कर प्रस्तुत करना चाहिए.
आपातकाल के काले दिनों का जिक्र करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा, “श्री रामनाथ गोयनका ने खाली संपादकीय प्रकाशित करके मौन की शक्ति का अद्भुत प्रदर्शन किया.” संपादकों की गिरफ्तारी, बिजली आपूर्ति में बाधा, आर्थिक नुकसान और हर तरह के उत्पीड़न के बावजूद उन्होंने लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया. यह खाली संपादकीय प्रेस की स्वतंत्रता और नागरिकों के अधिकार का सशक्त प्रतीक बन गया. उन्होंने गोयनका जी के जीवन यात्रा को भी याद किया और कहा कि दरभंगा से चेन्नई तक का सफर और विदिशा से सांसद के रूप में उनका कार्यकाल भारत की विविधता में एकता को दर्शाता है. उन्होंने अंग्रेजी के अलावा कई क्षेत्रीय भाषाओं में समाचार पत्र प्रकाशित कर आम जनता तक पहुंच बनाई.
उपराष्ट्रपति ने जोर देकर कहा कि चर्चा, बहस और असहमति का उद्देश्य राष्ट्र हित में निर्णय लेना होना चाहिए, न कि व्यवधान पैदा करना. प्रधानमंत्री के औपनिवेशिक मानसिकता त्यागने के आह्वान को याद करते हुए उन्होंने कहा कि मीडिया संस्थानों को वैश्विक और राष्ट्रीय घटनाओं को भारतीय सभ्यतागत मूल्यों से जोड़कर प्रस्तुत करना चाहिए.
अपने संबोधन के अंत में उपराष्ट्रपति ने सभी पुरस्कार विजेताओं को बधाई दी और आयोजकों की सराहना की कि वे पत्रकारिता में उत्कृष्टता की परंपरा को जीवित रखे हुए हैं.
(स्रोत: PIB)
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