
वैज्ञानिकों का कहना है कि चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जहां सूर्य की रोशनी कभी नहीं पहुंचती। इन क्षेत्रों का तापमान अत्यधिक कम रहता है, जिससे वहां अरबों वर्षों तक बर्फ सुरक्षित रह सकती है। इन्हें “Cold Traps” कहा जाता है।
रिपोर्ट के मुताबिक, शोध में विशेष रूप से फाउस्टिनी क्रेटर (Faustini Crater) और आसपास के क्षेत्रों का अध्ययन किया गया। चंद्रयान-1 और चंद्रयान-2 से मिले संयुक्त रडार डेटा की मदद से वैज्ञानिकों ने सतह के नीचे मौजूद पदार्थों की पहचान की। अध्ययन में कुछ ऐसे रडार संकेत मिले जो बर्फ और मिट्टी के मिश्रण की ओर इशारा करते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि चंद्रमा पर पर्याप्त मात्रा में बर्फ मौजूद होती है तो उसे भविष्य में पानी, ऑक्सीजन और यहां तक कि रॉकेट ईंधन तैयार करने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। यही कारण है कि दुनिया की कई अंतरिक्ष एजेंसियां चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव को भविष्य के मिशनों के लिए सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र मान रही हैं।
भारत ने अगस्त 2023 में चंद्रयान-3 के जरिए चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास सफल सॉफ्ट लैंडिंग कर इतिहास रचा था। भारत ऐसा करने वाला दुनिया का पहला देश बना था। इस मिशन के बाद अब चंद्रयान-2 के डेटा से मिली नई जानकारी ISRO की वैज्ञानिक उपलब्धियों को और मजबूत कर रही है।
ISRO का मानना है कि यह खोज भविष्य के मानव मिशनों के लिए बेहद उपयोगी साबित हो सकती है। NASA के आर्टेमिस कार्यक्रम (Artemis Program) समेत कई अंतरराष्ट्रीय मिशन भी चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर फोकस कर रहे हैं क्योंकि वहां पानी की मौजूदगी लंबे समय तक मानव उपस्थिति को संभव बना सकती है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि अभी और विस्तृत अध्ययन की जरूरत है, लेकिन शुरुआती परिणाम बेहद उत्साहजनक हैं। यह खोज अंतरिक्ष अनुसंधान में भारत की बढ़ती ताकत और चंद्र मिशनों में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका को दर्शाती है।