शी जिनपिंग का भावुक पत्र: 102 वर्षीय बुजुर्ग योद्धा झांग लियानशेंग की कहानी

जब बात देशभक्ति, इतिहास और बुजुर्गों के सम्मान की आती है, तो भारत और चीन जैसी पुरानी सभ्यताओं की सोच काफी हद तक एक जैसी नजर आती है। इन दिनों अंतरराष्ट्रीय मीडिया में चीन से आई एक खबर खूब सुर्खियां बटोर रही है।

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग (Xi Jinping) ने कम्युनिस्ट पार्टी की 105वीं वर्षगांठ से ठीक पहले, देश के एक 102 वर्षीय बुजुर्ग और पूर्व रेडियो ऑपरेटर झांग लियानशेंग (Zhang Liansheng) के पत्र का खुद जवाब दिया है।
 
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फाइल फोटो- चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग

पहली नजर में यह चीन की एक घरेलू राजनीतिक खबर लग सकती है, लेकिन अगर हम इसे भारत के नजरिए से देखें, तो इसमें हमारी युवा पीढ़ी, हमारे इतिहास और हमारे 'गुमनाम नायकों' के लिए एक बहुत बड़ा संदेश छिपा है। आइए इस दिलचस्प और भावुक कहानी को गहराई से समझते हैं।

कौन हैं 102 वर्षीय झांग लियानशेंग?

आज से लगभग 80 साल पहले, जब चीन अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रहा था और वहां 'मुक्ति युद्ध' (War of Liberation) छिड़ा हुआ था, तब झांग लियानशेंग एक युवा सैनिक थे। उन्होंने किसी बंदूक या तोप से नहीं, बल्कि अपनी तकनीक और समझदारी से देश की रक्षा की थी।

झांग उस समय सेना की एक बेहद गोपनीय और खास टुकड़ी का हिस्सा थे, जिसे "चौथी ब्रिगेड" (Fourth Brigade) कहा जाता था। उनका मुख्य काम एक रेडियो ऑपरेटर (Radio Operator) के रूप में देश के शीर्ष नेताओं और युद्ध के मैदान में लड़ रहे सैनिकों के बीच संपर्क बनाए रखना था।

मौत के साए में 'चौथी ब्रिगेड' का वो मिशन

उत्तरी शांक्सी के पथरीले पहाड़ों और घने जंगलों में, जहाँ हर वक्त दुश्मनों के बम बरस रहे थे, झांग और उनकी टीम ने संचार व्यवस्था को टूटने नहीं दिया। यह 'चौथी ब्रिगेड' असल में शिन्हुआ (Xinhua) समाचार एजेंसी की एक विशेष कामकाजी टीम थी।

युद्ध के समय में इस टीम की जिम्मेदारी सिर्फ खबरें पहुंचाना नहीं, बल्कि नेता माओ त्से तुंग (Mao Zedong) के गुप्त संदेशों को सेना तक बिना किसी गड़बड़ी के ट्रांसफर करना था। अगर झांग का सिग्नल एक मिनट के लिए भी टूट जाता, तो हजारों सैनिकों की जान जा सकती थी।

भारतीय नजरिया: हमारे गुमनाम 'सिग्नल कोर' के वीरों की याद

झांग लियानशेंग की यह कहानी सुनते ही हर भारतीय को तुरंत भारत के 'सिग्नल कोर' (Corps of Signals) और आजाद हिंद फौज (INA) के उन रेडियो ऑपरेटरों की याद आ जाएगी, जिन्होंने 1947, 1965 और 1971 के युद्धों में पहाड़ों और बंकरों में बैठकर भारतीय सेना के संचार तंत्र को संभाला था। भारत में भी ऐसे हजारों 'गुमनाम नायक' हैं, जिन्होंने कभी सुर्खियां नहीं बटोरीं, लेकिन देश की आजादी और सुरक्षा की नींव रखी।

राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने पत्र में क्या कहा?

चीनी राष्ट्रपति ने अपने पत्र में झांग लियानशेंग के इसी ऐतिहासिक योगदान की दिल खोलकर तारीफ की। शी जिनपिंग ने लिखा:

"लगभग आठ दशक पहले, आपने युद्ध की विभीषिकाओं के बीच पार्टी केंद्रीय समिति का दृढ़ता से अनुसरण किया और अपना पूरा जीवन संचार प्रौद्योगिकी (Communications Technology) के क्षेत्र को समर्पित कर दिया। देश के प्रति आपका यह अटूट विश्वास और गहरा प्रेम वाकई सराहनीय है।"

राष्ट्रपति ने झांग के अच्छे स्वास्थ्य और लंबी उम्र की कामना करते हुए उन्हें देश की 'जीवंत धरोहर' (Living Heritage) बताया।

शी जिनपिंग ने देश के युवाओं से अपील की कि वे अपने 'मूल उद्देश्य और स्थापना के संकल्प' (Original Aspiration and Founding Mission) को कभी न भूलें।

इस कहानी से हमारे लिए भी सबक

एक भारतीय पाठक के तौर पर, हमें इस अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम से ये तीन बातें जरूर सीखनी चाहिए:

1. 'गुमनाम नायकों' (Unsung Heroes) को सम्मान देना

भारत सरकार इन दिनों 'आजादी का अमृत महोत्सव' जैसे अभियानों के जरिए देश के गुमनाम स्वतंत्रता सेनानियों को ढूंढकर सम्मानित कर रही है। चीन के राष्ट्रपति का एक 102 साल के बुजुर्ग को पत्र लिखना दिखाता है कि कोई भी राष्ट्र तब तक महाशक्ति नहीं बन सकता, जब तक वह अपने इतिहास की आखिरी कड़ी (बुजुर्गों) को सहेज कर न रखे।

2. 'डिजिटल वॉरियर्स' के लिए सीख

झांग लियानशेंग उस दौर के मीडिया और संचार कर्मी (Communication Tech) थे जब तकनीक बहुत शुरुआती दौर में थी। आज भारत 'डिजिटल इंडिया' के दौर में है। आज के भारतीय युवाओं, ब्लॉगर्स और टेक प्रोफेशनल्स के लिए सबक यह है कि वे अपनी तकनीक और कलम का इस्तेमाल देश को जोड़ने और समाज को सही दिशा दिखाने के लिए करें।

3. 'संस्कृति और जड़ों' से जुड़ाव

भारत और चीन दोनों ही ऐसी सभ्यताएं हैं जहां 'पितृदेवो भव' या बुजुर्गों के सम्मान को सर्वोपरि माना गया है। आज के इस भागदौड़ भरे और पश्चिमीकरण के दौर में, यह कहानी याद दिलाती है कि हमारी असल ताकत हमारे बुजुर्गों के अनुभव और देश का इतिहास ही हैं।

सरहद की राजनीतिक दूरियों को अगर एक तरफ रख दिया जाए, तो झांग लियानशेंग जैसे बुजुर्ग योद्धा की कहानी हर उस भारतीय को प्रेरित करेगी जो अपने देश से प्यार करता है। यह कहानी हमें सिखाती है कि चाहे आप किसी भी पद पर हों, आपका छोटा सा योगदान भी इतिहास का रुख बदल सकता है।

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