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| जमीयत उलमा-ए-हिन्द के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी | फोटो क्रेडिट: मोहम्मद अतहर उद्दीन 'मुन्ने भारती' |
सम्मेलन को मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित करते हुए जमीयत उलमा-ए-हिन्द के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि सांप्रदायिक शक्तियों ने देश के माहौल को पूरी तरह खराब कर दिया है। उन्होंने वर्तमान परिस्थितियों को चुनौतीपूर्ण बताते हुए कहा कि नफ़रत की इन तेज़ आँधियों के बीच जमीयत उलमा-ए-हिन्द मोहब्बत के चिराग़ जलाने का प्रयास कर रही है।
उन्होंने जोर देकर कहा कि इस नकारात्मक माहौल को बदलना अनिवार्य है और इसके लिए समाज के हर स्तर पर गंभीर एवं व्यावहारिक प्रयास करने होंगे। लखनऊ में आयोजित यह सम्मेलन जमीयत उलमा-ए-हिन्द द्वारा एक व्यापक जनआंदोलन के रूप में शुरू की गई मुहिम का पहला चरण है। उन्होंने कहा कि जब तक विभिन्न धर्मों के समान विचार रखने वाले लोगों को एक मंच पर लाकर सांप्रदायिकता और नफ़रत के विरुद्ध संगठित आवाज़ नहीं उठाई जाएगी, तब तक अपेक्षित सामाजिक परिवर्तन संभव नहीं होगा। यह कार्य कठिन अवश्य है, लेकिन असंभव नहीं।
मौलाना मदनी ने कहा कि परिस्थितियां चाहे जितनी भी विस्फोटक क्यों न हों, देश के नागरिकों को निराश होने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि अपने चरित्र और कर्म से इस निराशा को आशा में बदलने का प्रयास करना चाहिए। इस मुहिम में देश का हर न्यायप्रिय नागरिक शामिल है।
इस घोषणा के कारण उन पर अंग्रेजों द्वारा अनेक अत्याचार किए गए और उनके मदरसे को भी ध्वस्त कर दिया गया, लेकिन अंग्रेज़ उनकी आवाज़ को दबा नहीं सके। उसी वैचारिक संघर्ष का परिणाम 1832 और 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के रूप में सामने आया, जिसमें हजारों उलेमा ने अपने प्राणों की कुरबानी दी। यद्यपि शुरुआती संघर्ष पूरी तरह सफल नहीं हुए, लेकिन धीरे-धीरे इस आवाज़ में लाखों लोग शामिल होते गए और अंततः अंग्रेज़ों को भारत छोड़कर जाना पड़ा। मौलाना मदनी ने कहा कि आज इस सम्मेलन से सांप्रदायिकता और नफ़रत के विरुद्ध जो आवाज़ उठी है, उसे भी कोई शक्ति दबा नहीं सकती। एक दिन ऐसा आएगा जब इस आवाज़ में करोड़ों लोगों की आवाज़ शामिल होगी और देश से नफ़रत का अंत होगा।
उन्होंने कहा कि जमीयत उलमा-ए-हिन्द का इतिहास इस बात का गवाह है कि उसने आज़ादी से पहले और आज़ादी के बाद भी हिंदुओं और मुसलमानों के बीच प्रेम, विश्वास और भाईचारे का पुल बनाने का कार्य किया है। संस्था के बुज़ुर्गों ने जिस वैचारिक मार्गदर्शन के साथ इसकी नींव रखी थी, आज भी संगठन उसी पर पूरी निष्ठा के साथ चल रहा है। जमीयत उलमा-ए-हिन्द का प्रत्येक कार्य धर्म से ऊपर उठकर केवल इंसानियत के आधार पर होता है।
इस संदर्भ में उन्होंने संगठन द्वारा किए गए कुछ प्रमुख सामाजिक कार्यों का उल्लेख किया:
इसके साथ ही रामपुर स्थित मौलाना मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय को लेकर चल रहे विवाद पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि बिना नक्शा स्वीकृत कराए भवन का निर्माण कराना निश्चित रूप से नियमों का उल्लंघन हो सकता है, लेकिन यह इतना बड़ा अपराध नहीं है कि पूरी शैक्षिक इमारत को ही मलबे में तब्दील कर दिया जाए। ऐसी स्थिति में कानून के अनुरूप विश्वविद्यालय पर आर्थिक जुर्माना लगाया जा सकता है या अन्य सुधारात्मक कार्रवाई की जा सकती है। यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि यदि विश्वविद्यालय को ध्वस्त किया गया तो वहाँ पढ़ने वाले हजारों छात्रों का भविष्य प्रभावित होगा। उन्होंने कहा कि ऐसी नौबत इसलिए आई है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों से लगातार नफ़रत की राजनीति की जा रही है और एक विशेष समुदाय को कटघरे में खड़ा करने का प्रयास किया जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जय सिंह ने कहा कि आज का यह सम्मेलन देश में एकता, सद्भाव और भाईचारे का सशक्त संदेश देता है। भारतीय संविधान ने सभी नागरिकों को समान अधिकार दिए हैं तथा किसी के साथ भेदभाव न करने की स्पष्ट व्यवस्था की है। उन्होंने कहा कि देश के वर्तमान हालात देखकर उन्हें अक्सर चिंता होती थी, लेकिन आज इस सम्मेलन में सभी धर्मों के लोगों की सक्रिय सहभागिता देखकर उन्हें विश्वास हो गया है कि इस देश के सामाजिक ताने-बाने को कोई तोड़ नहीं सकता।
उन्होंने बुद्धिजीवी वर्ग की भूमिका पर टिप्पणी करते हुए कहा कि दुःख की बात यह है कि लोकतंत्र को दिशा दिखाने वाला बुद्धिजीवी वर्ग आज मौन है। यह स्थिति अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण और निराशाजनक है। मौलाना अरशद मदनी ने देश को जोड़ने का जो कार्य शुरू किया है, उसमें हम सबको उनका साथ देना चाहिए।
उन्होंने बताया कि इस अभियान के अंतर्गत पूरे देश में विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे, जिनमें उलेमा, धार्मिक नेता, बुद्धिजीवी, विधि विशेषज्ञ, सामाजिक कार्यकर्ता और युवा भाग लेंगे। मौलाना असजद मदनी ने अंत में सभी उपस्थित लोगों से अपील की कि वे इस प्रेम और सद्भाव के संदेश को अपने घरों, मोहल्लों, शिक्षण संस्थानों और समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुंचाएं।
जमीयत उलमा-ए-हिन्द उत्तर प्रदेश के प्रांतीय अध्यक्ष मौलाना अशहद रशीदी ने सम्मेलन में पधारे सभी विशिष्ट अतिथियों का हार्दिक स्वागत और धन्यवाद किया। उन्होंने कहा कि यह एकता किसी राजनीतिक स्वार्थ पर आधारित नहीं है, बल्कि भारत की साझा संस्कृति पर आधारित है। सम्मेलन को बौद्ध, ईसाई तथा सिख धर्म के प्रमुख प्रतिनिधियों ने भी संबोधित किया और सभी वक्ताओं ने एक स्वर में इस मुहिम को समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बताते हुए अपना समर्थन व्यक्त किया।
देश के वर्तमान सामाजिक-राजनीतिक हालात पर चिंता
मौलाना अरशद मदनी ने अपने संबोधन में देश की मौजूदा स्थिति का गहराई से विश्लेषण किया। उन्होंने कहा कि पहले केवल देश के मुसलमान सांप्रदायिक शक्तियों के निशाने पर हुआ करते थे, लेकिन पिछले कुछ वर्षों के दौरान नफ़रत की राजनीति ने ऐसा रूप ले लिया है कि अब मुसलमानों के साथ-साथ इस्लाम धर्म भी निशाने पर है। इस प्रकार की राजनीति ने देश को एक ऐसे दोराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहाँ से आगे का रास्ता और भविष्य स्पष्ट दिखाई नहीं देता।उन्होंने जोर देकर कहा कि इस नकारात्मक माहौल को बदलना अनिवार्य है और इसके लिए समाज के हर स्तर पर गंभीर एवं व्यावहारिक प्रयास करने होंगे। लखनऊ में आयोजित यह सम्मेलन जमीयत उलमा-ए-हिन्द द्वारा एक व्यापक जनआंदोलन के रूप में शुरू की गई मुहिम का पहला चरण है। उन्होंने कहा कि जब तक विभिन्न धर्मों के समान विचार रखने वाले लोगों को एक मंच पर लाकर सांप्रदायिकता और नफ़रत के विरुद्ध संगठित आवाज़ नहीं उठाई जाएगी, तब तक अपेक्षित सामाजिक परिवर्तन संभव नहीं होगा। यह कार्य कठिन अवश्य है, लेकिन असंभव नहीं।
मौलाना मदनी ने कहा कि परिस्थितियां चाहे जितनी भी विस्फोटक क्यों न हों, देश के नागरिकों को निराश होने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि अपने चरित्र और कर्म से इस निराशा को आशा में बदलने का प्रयास करना चाहिए। इस मुहिम में देश का हर न्यायप्रिय नागरिक शामिल है।
स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास का स्मरण
इतिहास का उल्लेख करते हुए मौलाना मदनी ने बताया कि जब अंग्रेज़ों का पूरे देश पर कब्जा स्थापित हो गया था, तब उसके विरुद्ध पहली बुलंद आवाज़ दिल्ली के एक मदरसे से उठी थी। यह आवाज़ हज़रत शाह अब्दुल अज़ीज़ मुहद्दिस देहलवी की थी। उन्होंने उस समय घोषणा की थी कि देश गुलाम हो चुका है, इसलिए अंग्रेज़ों के विरुद्ध संघर्ष करना प्रत्येक मुसलमान और भारतीय नागरिक का कर्तव्य है।इस घोषणा के कारण उन पर अंग्रेजों द्वारा अनेक अत्याचार किए गए और उनके मदरसे को भी ध्वस्त कर दिया गया, लेकिन अंग्रेज़ उनकी आवाज़ को दबा नहीं सके। उसी वैचारिक संघर्ष का परिणाम 1832 और 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के रूप में सामने आया, जिसमें हजारों उलेमा ने अपने प्राणों की कुरबानी दी। यद्यपि शुरुआती संघर्ष पूरी तरह सफल नहीं हुए, लेकिन धीरे-धीरे इस आवाज़ में लाखों लोग शामिल होते गए और अंततः अंग्रेज़ों को भारत छोड़कर जाना पड़ा। मौलाना मदनी ने कहा कि आज इस सम्मेलन से सांप्रदायिकता और नफ़रत के विरुद्ध जो आवाज़ उठी है, उसे भी कोई शक्ति दबा नहीं सकती। एक दिन ऐसा आएगा जब इस आवाज़ में करोड़ों लोगों की आवाज़ शामिल होगी और देश से नफ़रत का अंत होगा।
जमीयत उलमा-ए-हिन्द की गैर-राजनीतिक भूमिका और कार्य
मौलाना मदनी ने एक बार फिर मंच से स्पष्ट किया कि जमीयत उलमा-ए-हिन्द एक शुद्ध धार्मिक और सामाजिक संगठन है और उसका राजनीति से कोई संबंध नहीं है। संगठन अपने नेतृत्व में न तो चुनाव लड़ता है और न ही किसी को चुनाव लड़ाता है। संस्था का मुख्य उद्देश्य केवल देश में भाईचारे, एकता और सद्भाव का संदेश देना है। नफ़रत केवल विनाश और बर्बादी लाती है, जिसका दृश्य आज पूरा देश देख रहा है।उन्होंने कहा कि जमीयत उलमा-ए-हिन्द का इतिहास इस बात का गवाह है कि उसने आज़ादी से पहले और आज़ादी के बाद भी हिंदुओं और मुसलमानों के बीच प्रेम, विश्वास और भाईचारे का पुल बनाने का कार्य किया है। संस्था के बुज़ुर्गों ने जिस वैचारिक मार्गदर्शन के साथ इसकी नींव रखी थी, आज भी संगठन उसी पर पूरी निष्ठा के साथ चल रहा है। जमीयत उलमा-ए-हिन्द का प्रत्येक कार्य धर्म से ऊपर उठकर केवल इंसानियत के आधार पर होता है।
इस संदर्भ में उन्होंने संगठन द्वारा किए गए कुछ प्रमुख सामाजिक कार्यों का उल्लेख किया:
- बाढ़ राहत कार्य: केरल और पंजाब में आई भीषण बाढ़ के दौरान जमीयत उलमा-ए-हिन्द और उसके कार्यकर्ताओं ने बिना किसी धार्मिक भेदभाव के पीड़ितों की सहायता की। केरल में बाढ़ से नष्ट हुए अनेक मकानों का पुनर्निर्माण कराया गया और इस दौरान किसी व्यक्ति का धर्म नहीं देखा गया।
- असम नागरिकता मामला: असम में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) के दौरान लगभग 40 लाख महिलाओं की नागरिकता पर संकट मंडरा रहा था। इन महिलाओं में लगभग 25 लाख गैर-मुस्लिम महिलाएँ भी शामिल थीं। जमीयत उलमा-ए-हिन्द ने इस मामले को देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) में मजबूती से लड़ा और सफलता प्राप्त की, जिसके परिणामस्वरूप उन सभी 40 लाख महिलाओं की नागरिकता सुरक्षित हो सकी।
पेपर लीक और जौहर यूनिवर्सिटी विवाद पर बयान
सम्मेलन के दौरान मौलाना मदनी ने देश के कुछ समसामयिक प्रशासनिक और शैक्षिक मुद्दों पर भी अपने विचार रखे। दिल्ली में प्रदर्शन कर रहे विद्यार्थियों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि लगातार हो रहे पेपर लीक ने लाखों युवाओं के भविष्य को अंधकार में डाल दिया है। ऐसा नहीं होना चाहिए। अब समय आ गया है कि ऐसी कमजोर व्यवस्था को बदला जाए, जो परीक्षाओं की शुचिता और गोपनीयता तक नहीं रोक सकती।इसके साथ ही रामपुर स्थित मौलाना मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय को लेकर चल रहे विवाद पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि बिना नक्शा स्वीकृत कराए भवन का निर्माण कराना निश्चित रूप से नियमों का उल्लंघन हो सकता है, लेकिन यह इतना बड़ा अपराध नहीं है कि पूरी शैक्षिक इमारत को ही मलबे में तब्दील कर दिया जाए। ऐसी स्थिति में कानून के अनुरूप विश्वविद्यालय पर आर्थिक जुर्माना लगाया जा सकता है या अन्य सुधारात्मक कार्रवाई की जा सकती है। यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि यदि विश्वविद्यालय को ध्वस्त किया गया तो वहाँ पढ़ने वाले हजारों छात्रों का भविष्य प्रभावित होगा। उन्होंने कहा कि ऐसी नौबत इसलिए आई है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों से लगातार नफ़रत की राजनीति की जा रही है और एक विशेष समुदाय को कटघरे में खड़ा करने का प्रयास किया जा रहा है।
बुद्धिजीवी वर्ग के मौन और अन्याय पर अतिथियों के विचार
सम्मेलन में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित वाराणसी के संकट मोचन हनुमान मंदिर के महंत डॉ. बिशंभर नाथ मिश्र ने अपने संबोधन में कहा कि देश की आज़ादी में सभी वर्गों का खून शामिल है और इस मिट्टी में सबका लहू रचा-बसा है, जिसे कभी अलग नहीं किया जा सकता। उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज ऐसे हालात इसलिए बने हैं क्योंकि लोगों ने सच बोलना छोड़ दिया है और हर व्यक्ति इस इंतज़ार में रहता है कि कोई दूसरा आवाज़ उठाए। इस तरह देश नहीं चल सकता। अब देश में हो रहे अन्याय के विरुद्ध हर नागरिक को खुलकर बोलना होगा। उन्होंने मौलाना अरशद मदनी द्वारा शुरू की गई इस सद्भाव मुहिम का पूर्ण समर्थन किया।सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जय सिंह ने कहा कि आज का यह सम्मेलन देश में एकता, सद्भाव और भाईचारे का सशक्त संदेश देता है। भारतीय संविधान ने सभी नागरिकों को समान अधिकार दिए हैं तथा किसी के साथ भेदभाव न करने की स्पष्ट व्यवस्था की है। उन्होंने कहा कि देश के वर्तमान हालात देखकर उन्हें अक्सर चिंता होती थी, लेकिन आज इस सम्मेलन में सभी धर्मों के लोगों की सक्रिय सहभागिता देखकर उन्हें विश्वास हो गया है कि इस देश के सामाजिक ताने-बाने को कोई तोड़ नहीं सकता।
उन्होंने बुद्धिजीवी वर्ग की भूमिका पर टिप्पणी करते हुए कहा कि दुःख की बात यह है कि लोकतंत्र को दिशा दिखाने वाला बुद्धिजीवी वर्ग आज मौन है। यह स्थिति अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण और निराशाजनक है। मौलाना अरशद मदनी ने देश को जोड़ने का जो कार्य शुरू किया है, उसमें हम सबको उनका साथ देना चाहिए।
देशव्यापी अभियान का घोषणा-पत्र और समापन
इस अभियान के संयोजक एवं जमीयत उलमा-ए-हिन्द के उपाध्यक्ष मौलाना असजद मदनी ने सम्मेलन का आधिकारिक घोषणा-पत्र पढ़कर सुनाया, जिसका वहां उपस्थित सभी लोगों ने हाथ उठाकर समर्थन किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस कार्यक्रम का उद्देश्य देश से सांप्रदायिकता, नफ़रत और आपसी दूरियों को समाप्त कर भारत की प्राचीन साझा संस्कृति, प्रेम, सहिष्णुता और भाईचारे की परंपरा को पुनः सशक्त बनाना है। यह अभियान पूरी तरह गैर-राजनीतिक है और इसका उद्देश्य केवल विभिन्न धर्मों, समुदायों तथा सामाजिक वर्गों के बीच विश्वास और पारस्परिक सहयोग को बढ़ावा देना है।उन्होंने बताया कि इस अभियान के अंतर्गत पूरे देश में विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे, जिनमें उलेमा, धार्मिक नेता, बुद्धिजीवी, विधि विशेषज्ञ, सामाजिक कार्यकर्ता और युवा भाग लेंगे। मौलाना असजद मदनी ने अंत में सभी उपस्थित लोगों से अपील की कि वे इस प्रेम और सद्भाव के संदेश को अपने घरों, मोहल्लों, शिक्षण संस्थानों और समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुंचाएं।
जमीयत उलमा-ए-हिन्द उत्तर प्रदेश के प्रांतीय अध्यक्ष मौलाना अशहद रशीदी ने सम्मेलन में पधारे सभी विशिष्ट अतिथियों का हार्दिक स्वागत और धन्यवाद किया। उन्होंने कहा कि यह एकता किसी राजनीतिक स्वार्थ पर आधारित नहीं है, बल्कि भारत की साझा संस्कृति पर आधारित है। सम्मेलन को बौद्ध, ईसाई तथा सिख धर्म के प्रमुख प्रतिनिधियों ने भी संबोधित किया और सभी वक्ताओं ने एक स्वर में इस मुहिम को समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बताते हुए अपना समर्थन व्यक्त किया।
रिपोर्ट: मोहम्मद अतहर उद्दीन 'मुन्ने भारती' (वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता और वकील)
