
आरबीआई ने न केवल इसके खतरों से आगाह किया है, बल्कि सरकार को एक ऐसी 'कंटेनमेंट स्ट्रेटजी' (Containment Strategy) अपनाने की सलाह दी है जो पूरी तरह से इस पर प्रतिबंध (Prohibition) लगाने की ओर इशारा करती है। बीजेपी सांसद भर्तृहरि महताब की अध्यक्षता वाली इस समिति के सामने आरबीआई के डिप्टी गवर्नर रोहित जैन और कार्यकारी निदेशक पी. वासुदेवन ने केंद्रीय बैंक का पक्ष रखा और बताया कि क्यों इस डिजिटल एसेट पर लगाम लगाना देश के हित में है।
सबसे बड़ा खतरा देश की मौद्रिक संप्रभुता (Monetary Sovereignty) को लेकर है। यदि देश में निजी तौर पर जारी किए जाने वाले 'स्टेबलकॉइन्स' (Stablecoins) का चलन व्यापक रूप से बढ़ गया, तो यह भारतीय रुपये के एकाधिकार को चुनौती देगा। जब लोग देश की आधिकारिक मुद्रा के बजाय डिजिटल टोकन में लेनदेन करने लगेंगे, तो रिज़र्व बैंक की मौद्रिक नीतियों (Monetary Policies) का बाज़ार पर कोई नियंत्रण नहीं रह जाएगा। इससे महंगाई को काबू करना और देश की आर्थिक विकास दर को संभालना सरकार और आरबीआई दोनों के लिए असंभव हो जाएगा।
इसके अलावा, आरबीआई ने सुरक्षा और अपराध के मोर्चे पर भी गंभीर चिंताएं जताई हैं। चूंकि क्रिप्टो ट्रांजैक्शन ब्लॉकचेन नेटवर्क पर होते हैं और अत्यधिक गोपनीय होते हैं, इसलिए यह सिस्टम टैक्स चोरी, मनी लॉन्ड्रिंग, ड्रग तस्करी और टेरर फंडिंग (आतंकवादी वित्तपोषण) जैसी अवैध गतिविधियों का एक सुरक्षित जरिया बन चुका है। सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि क्रिप्टो का कारोबार करने वाली अधिकांश एक्सचेंज और संस्थाएं विदेशों (Offshore Entities) से संचालित होती हैं। ऐसे में भारतीय नियामक और जांच एजेंसियों (जैसे FIU और ED) के लिए इन पर निगरानी रखना या इन्हें किसी नियम के दायरे में लाना लगभग नामुमकिन है।
केंद्रीय बैंक द्वारा साझा किए गए वास्तविक आंकड़ों के अनुसार, भारत में वर्तमान में केवल 54 FIU-रजिस्टर्ड क्रिप्टो सेवा प्रदाता हैं। वहीं, पूरे देश में लगभग 3.93 करोड़ केवाईसी-सत्यापित (KYC-verified) उपयोगकर्ता हैं, जिनके पास कुल मिलाकर करीब ₹20,436.59 करोड़ के क्रिप्टो एसेट्स हैं। यह आंकड़ा भारत की विशाल आबादी और मुख्यधारा के वित्तीय बाजार (जैसे शेयर बाजार या म्यूचुअल फंड) के मुकाबले बेहद छोटा है।
भले ही वर्तमान में भारत सरकार क्रिप्टोकरेंसी से होने वाले मुनाफे पर 30% भारी-भरकम टैक्स और 1% TDS वसूल रही है, लेकिन आरबीआई का यह ताजा रुख दिखाता है कि देश में क्रिप्टो को कभी भी कानूनी मान्यता (Legal Tender) नहीं मिलने वाली है। रिज़र्व बैंक की इस बेहद सख्त रिपोर्ट के बाद अब गेंद सरकार के पाले में है कि क्या वह आगामी डिजिटल एसेट बिल में क्रिप्टो पर पूरी तरह से ताला लगाएगी या फिर इस पर सख्त प्रतिबंधों की ओर बढ़ेगी। निवेशकों के लिए फिलहाल सतर्क रहने की जरूरत है, क्योंकि भारतीय वित्तीय व्यवस्था में क्रिप्टो के लिए रास्ते बंद होते दिख रहे हैं।
आखिर क्यों क्रिप्टोकरेंसी को पूरी तरह बैन करना चाहता है RBI?
रिजर्व बैंक लंबे समय से क्रिप्टो एसेट्स का विरोध करता रहा है, लेकिन इस बार संसदीय समिति के सामने बैंक ने बेहद ठोस और रणनीतिक दलीलें पेश की हैं। आरबीआई का मानना है कि क्रिप्टोकरेंसी का स्वभाव ऐसा है जो देश की पारंपरिक बैंकिंग प्रणाली को पूरी तरह से पंगु बना सकता है।सबसे बड़ा खतरा देश की मौद्रिक संप्रभुता (Monetary Sovereignty) को लेकर है। यदि देश में निजी तौर पर जारी किए जाने वाले 'स्टेबलकॉइन्स' (Stablecoins) का चलन व्यापक रूप से बढ़ गया, तो यह भारतीय रुपये के एकाधिकार को चुनौती देगा। जब लोग देश की आधिकारिक मुद्रा के बजाय डिजिटल टोकन में लेनदेन करने लगेंगे, तो रिज़र्व बैंक की मौद्रिक नीतियों (Monetary Policies) का बाज़ार पर कोई नियंत्रण नहीं रह जाएगा। इससे महंगाई को काबू करना और देश की आर्थिक विकास दर को संभालना सरकार और आरबीआई दोनों के लिए असंभव हो जाएगा।
इसके अलावा, आरबीआई ने सुरक्षा और अपराध के मोर्चे पर भी गंभीर चिंताएं जताई हैं। चूंकि क्रिप्टो ट्रांजैक्शन ब्लॉकचेन नेटवर्क पर होते हैं और अत्यधिक गोपनीय होते हैं, इसलिए यह सिस्टम टैक्स चोरी, मनी लॉन्ड्रिंग, ड्रग तस्करी और टेरर फंडिंग (आतंकवादी वित्तपोषण) जैसी अवैध गतिविधियों का एक सुरक्षित जरिया बन चुका है। सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि क्रिप्टो का कारोबार करने वाली अधिकांश एक्सचेंज और संस्थाएं विदेशों (Offshore Entities) से संचालित होती हैं। ऐसे में भारतीय नियामक और जांच एजेंसियों (जैसे FIU और ED) के लिए इन पर निगरानी रखना या इन्हें किसी नियम के दायरे में लाना लगभग नामुमकिन है।
क्यों रेगुलेशन के बजाय बैन जरूरी है?
आरबीआई ने स्पष्ट किया है कि क्रिप्टो को नियमित (Regulate) करने की कोशिशें क्यों बेकार साबित होंगी। केंद्रीय बैंक ने इसके लिए निम्नलिखित मुख्य तर्क दिए हैं:- सुरक्षा का झूठा भ्रम: अगर सरकार पारंपरिक वित्तीय उत्पादों की तरह क्रिप्टो को भी रेगुलेट करने की कोशिश करती है, तो आम निवेशकों के बीच इसकी सुरक्षा को लेकर एक 'झूठा भ्रम' (False Perception of Safety) पैदा होगा। लोग इसे सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त सुरक्षित निवेश समझने लगेंगे, जबकि असल में यह एक अत्यधिक सट्टा और जोखिम भरा उत्पाद है जिसका कोई ठोस आर्थिक आधार नहीं है। यदि कल को कोई बड़ा क्रिप्टो एक्सचेंज डूबता है, तो आम जनता की गाढ़ी कमाई पल भर में स्वाहा हो जाएगी और इसकी जिम्मेदारी अंततः सरकार पर आएगी।
- बैंकिंग क्षेत्र को खतरा: आरबीआई का रुख बेहद स्पष्ट है कि देश के बैंकिंग सेक्टर और वित्तीय प्रणालियों को क्रिप्टो एसेट्स से पूरी तरह दूर रखा जाना चाहिए। केंद्रीय बैंक का मानना है कि यदि बैंकों को इसमें शामिल होने या इसके एवज में लोन देने की अनुमति दी गई, तो यह पूरी वित्तीय प्रणाली को अस्थिर कर देगा।
'भारत दुनिया का सबसे बड़ा क्रिप्टो बाजार' - दावे को बताया गलत
आरबीआई ने वैश्विक स्तर पर चल रही उन रिपोर्ट्स और दावों को भी सिरे से खारिज कर दिया है, जिसमें बार-बार यह कहा जाता है कि भारत दुनिया में क्रिप्टोकरेंसी का सबसे बड़ा अपनाने वाला (Crypto Adopter) देश है। आरबीआई ने संसदीय समिति को बताया कि निजी ब्लॉकचेन एनालिटिक्स कंपनियों द्वारा तैयार किए गए ये आंकड़े कार्यप्रणाली के स्तर पर त्रुटिपूर्ण (Methodologically Flawed) हैं और भारत जैसे बड़ी आबादी वाले देशों के आंकड़ों को केवल अनुमानों के आधार पर बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं।केंद्रीय बैंक द्वारा साझा किए गए वास्तविक आंकड़ों के अनुसार, भारत में वर्तमान में केवल 54 FIU-रजिस्टर्ड क्रिप्टो सेवा प्रदाता हैं। वहीं, पूरे देश में लगभग 3.93 करोड़ केवाईसी-सत्यापित (KYC-verified) उपयोगकर्ता हैं, जिनके पास कुल मिलाकर करीब ₹20,436.59 करोड़ के क्रिप्टो एसेट्स हैं। यह आंकड़ा भारत की विशाल आबादी और मुख्यधारा के वित्तीय बाजार (जैसे शेयर बाजार या म्यूचुअल फंड) के मुकाबले बेहद छोटा है।
तकनीक का समर्थन, लेकिन क्रिप्टो का कड़ा विरोध
आरबीआई ने यह भी साफ किया कि वह आधुनिक तकनीकों के खिलाफ नहीं है। केंद्रीय बैंक ब्लॉकचेन टेक्नोलॉजी (Blockchain Technology) और वित्तीय संपत्तियों के टोकनाइजेशन (Tokenization) का पूरी तरह समर्थन करता है। आरबीआई ने नीति निर्माताओं से आग्रह किया है कि वे सरकारी प्रतिभूतियों (Government Securities) और कॉर्पोरेट बॉन्ड जैसी विनियमित वित्तीय संपत्तियों के टोकनाइजेशन को क्रिप्टोकरेंसी से पूरी तरह अलग रखें, ताकि देश में तकनीकी नवाचार (Innovation) बाधित न हो। क्रिप्टो की जगह आरबीआई खुद की सॉवरेन डिजिटल करेंसी यानी CBDC (e-Rupee) को मजबूत करने की वकालत कर रहा है, जो सुरक्षित भी है और डिजिटल इंडिया के विजन के अनुकूल भी।भले ही वर्तमान में भारत सरकार क्रिप्टोकरेंसी से होने वाले मुनाफे पर 30% भारी-भरकम टैक्स और 1% TDS वसूल रही है, लेकिन आरबीआई का यह ताजा रुख दिखाता है कि देश में क्रिप्टो को कभी भी कानूनी मान्यता (Legal Tender) नहीं मिलने वाली है। रिज़र्व बैंक की इस बेहद सख्त रिपोर्ट के बाद अब गेंद सरकार के पाले में है कि क्या वह आगामी डिजिटल एसेट बिल में क्रिप्टो पर पूरी तरह से ताला लगाएगी या फिर इस पर सख्त प्रतिबंधों की ओर बढ़ेगी। निवेशकों के लिए फिलहाल सतर्क रहने की जरूरत है, क्योंकि भारतीय वित्तीय व्यवस्था में क्रिप्टो के लिए रास्ते बंद होते दिख रहे हैं।