पश्चिम बंगाल के मान्यता प्राप्त मदरसों में कार्यरत सैकड़ों शिक्षण और गैर-शिक्षण कर्मचारियों को देश की सर्वोच्च अदालत से बड़ा झटका लगा है। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने सोमवार (13 जुलाई 2026) को एक अहम फैसला सुनाते हुए पश्चिम बंगाल के करीब 360 मदरसा शिक्षकों और स्टाफ की उस याचिका को सिरे से खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने अपनी नौकरियों के नियमितीकरण (Regularisation) और राज्य सरकार की 'ग्रांट-इन-एड' (Grant-in-Aid) योजना के तहत वेतन भुगतान की मांग की थी।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस अगस्त्य जॉर्ज मसीह की पीठ ने इस मामले पर फैसला सुनाते हुए कहा कि इन याचिकाओं में कोई दम नहीं है। अदालत के इस फैसले के बाद उन कर्मचारियों की उम्मीदों पर पानी फिर गया है जो पिछले कई वर्षों से कानूनी लड़ाई लड़ रहे थे।
फैसला सुनाते हुए पीठ ने कहा, "हमने इस आधार पर मामले की जांच शुरू की थी कि यदि इन 13 याचिकाकर्ताओं में से कोई एक भी हमें अपने पक्ष में फैसला देने के लिए राजी या प्रभावित कर पाता है, तो हम बाकी के सभी मामलों की भी विस्तार से जांच करेंगे। लेकिन दुर्भाग्य से, इन 13 याचिकाकर्ताओं में से कोई भी अदालत को प्रभावित करने या अपना पक्ष साबित करने में सफल नहीं हो सका।"
अदालत ने आगे कहा कि जब मुख्य मामलों में ही कोई योग्यता या मेरिट नहीं पाई गई, तो बाकी बचे मामलों पर विचार करने का कोई औचित्य नहीं रह जाता। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने सभी याचिकाओं को 'मेरिट से विहीन' मानते हुए पूरी तरह से खारिज कर दिया।
इसके बाद इस कानून की वैधता को अदालत में चुनौती दी गई। साल 2014 में कलकत्ता हाईकोर्ट की एकल पीठ ने इस अधिनियम को असंवैधानिक घोषित कर दिया था, जिसे 2015 में हाईकोर्ट की खंडपीठ ने भी सही ठहराया। हाईकोर्ट का मानना था कि यह कानून संविधान के अनुच्छेद 30 (अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने और चलाने का अधिकार) का उल्लंघन करता है।
इस कानूनी खींचतान के बीच (2015 से 2020 के दौरान), कई मदरसों में प्रबंधन समितियों द्वारा नियमों से अलग हटकर नियुक्तियां कर ली गई थीं। फरवरी 2023 में, सुप्रीम कोर्ट ने एक विशेष समिति का गठन किया ताकि यह जांचा जा सके कि इस अवधि के दौरान की गई नियुक्तियां वैध हैं या नहीं और क्या ये कर्मचारी सरकारी अनुदान के तहत वेतन पाने के हकदार हैं।
इस समिति ने अपनी जांच में पाया कि ये नियुक्तियां तय कानूनी ढांचे के बाहर की गई थीं, इसलिए इन्हें अमान्य करार दिया गया। समिति के इसी फैसले को चुनौती देते हुए इन 360 कर्मचारियों ने सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद 32 के तहत रिट याचिकाएं दायर की थीं, जिसे अब कोर्ट ने खारिज कर दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट की दो न्यायाधीशों की पीठ ने साफ किया कि उन्होंने इस मामले को बेहद गहराई से परखा है। करीब 360 कर्मचारियों की ओर से कुल 48 याचिकाएं दायर की गई थीं। अदालत ने पूरी प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करने के लिए इनमें से 13 'टेस्ट केस' (प्रतिनिधि कर्ताओं) के दस्तावेजों और दलीलों की गहन जांच की।फैसला सुनाते हुए पीठ ने कहा, "हमने इस आधार पर मामले की जांच शुरू की थी कि यदि इन 13 याचिकाकर्ताओं में से कोई एक भी हमें अपने पक्ष में फैसला देने के लिए राजी या प्रभावित कर पाता है, तो हम बाकी के सभी मामलों की भी विस्तार से जांच करेंगे। लेकिन दुर्भाग्य से, इन 13 याचिकाकर्ताओं में से कोई भी अदालत को प्रभावित करने या अपना पक्ष साबित करने में सफल नहीं हो सका।"
अदालत ने आगे कहा कि जब मुख्य मामलों में ही कोई योग्यता या मेरिट नहीं पाई गई, तो बाकी बचे मामलों पर विचार करने का कोई औचित्य नहीं रह जाता। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने सभी याचिकाओं को 'मेरिट से विहीन' मानते हुए पूरी तरह से खारिज कर दिया।
क्या है विवाद की जड़?
यह पूरा कानूनी विवाद 'पश्चिम बंगाल मदरसा सर्विस कमीशन एक्ट, 2008' (West Bengal Madrasah Service Commission Act, 2008) से जुड़ा हुआ है। इस कानून के तहत राज्य सरकार ने एक वैधानिक आयोग का गठन किया था, जिसका काम मान्यता प्राप्त मदरसों में शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों की नियुक्ति के लिए सिफारिशें करना था। इस कानून ने मदरसों की स्थानीय प्रबंधन समितियों से शिक्षकों को नियुक्त करने का पारंपरिक अधिकार छीन लिया था।इसके बाद इस कानून की वैधता को अदालत में चुनौती दी गई। साल 2014 में कलकत्ता हाईकोर्ट की एकल पीठ ने इस अधिनियम को असंवैधानिक घोषित कर दिया था, जिसे 2015 में हाईकोर्ट की खंडपीठ ने भी सही ठहराया। हाईकोर्ट का मानना था कि यह कानून संविधान के अनुच्छेद 30 (अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने और चलाने का अधिकार) का उल्लंघन करता है।
कानूनी पेंच और 2023 की समिति की रिपोर्ट
हाईकोर्ट द्वारा कानून रद्द किए जाने के बाद, साल 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले पर अंतरिम रोक लगा दी थी। इसके बाद जनवरी 2020 में एक बड़ा मोड़ आया जब सुप्रीम कोर्ट ने 2008 के इस अधिनियम की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा।इस कानूनी खींचतान के बीच (2015 से 2020 के दौरान), कई मदरसों में प्रबंधन समितियों द्वारा नियमों से अलग हटकर नियुक्तियां कर ली गई थीं। फरवरी 2023 में, सुप्रीम कोर्ट ने एक विशेष समिति का गठन किया ताकि यह जांचा जा सके कि इस अवधि के दौरान की गई नियुक्तियां वैध हैं या नहीं और क्या ये कर्मचारी सरकारी अनुदान के तहत वेतन पाने के हकदार हैं।
इस समिति ने अपनी जांच में पाया कि ये नियुक्तियां तय कानूनी ढांचे के बाहर की गई थीं, इसलिए इन्हें अमान्य करार दिया गया। समिति के इसी फैसले को चुनौती देते हुए इन 360 कर्मचारियों ने सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद 32 के तहत रिट याचिकाएं दायर की थीं, जिसे अब कोर्ट ने खारिज कर दिया है।
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