डोनाल्ड ट्रंप के 100 दिन पूरे: अमेरिका की नीतियों में बड़ा बदलाव

डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका के राष्ट्रपति के रूप में अपने दूसरे कार्यकाल के 100 दिन पूरे कर लिए हैं। इस दौरान उन्होंने आक्रामक नीतिगत फैसलों और तेज़-तर्रार कार्यशैली से अमेरिका की आंतरिक और वैश्विक राजनीति में हलचल मचा दी है। चाहे बात हो ट्रेड पॉलिसी की, इमिग्रेशन कानूनों की, शेयर बाजार की या कार्यकारी आदेशों की – ट्रंप ने हर मोर्चे पर स्पष्ट और कट्टर रुख अपनाया है।

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप

ट्रेड पॉलिसी में सख्ती:
ट्रंप प्रशासन ने 'अमेरिका फर्स्ट' नीति को और मजबूत करते हुए चीन, मेक्सिको और यूरोपीय यूनियन पर कई नए व्यापारिक प्रतिबंध लगाए हैं। उनके अनुसार, अमेरिका के उद्योगों को सस्ते विदेशी माल से बचाना जरूरी है। उन्होंने फिर से चीन पर ‘अनफेयर ट्रेड प्रैक्टिस’ का आरोप लगाते हुए कुछ पुराने समझौते रद्द किए हैं और अमेरिका में निर्माण को बढ़ावा देने के लिए टैक्स इंसेंटिव की घोषणा की है।

इमिग्रेशन नीति में बदलाव:
ट्रंप ने एक बार फिर इमिग्रेशन को लेकर सख्ती दिखाई है। उन्होंने अमेरिका-मेक्सिको सीमा पर वॉल निर्माण की गति बढ़ाई है और कई देशों से आने वाले अप्रवासियों पर रोक लगाने की प्रक्रिया शुरू की है। साथ ही, अवैध अप्रवासियों की धरपकड़ और निर्वासन की कार्रवाइयों में तेजी लाई गई है, जिससे अमेरिका में रह रहे अप्रवासी समुदायों में चिंता का माहौल है।

शेयर बाजार की प्रतिक्रिया:
ट्रंप के कई फैसलों का असर अमेरिका के शेयर बाजार पर भी पड़ा है। शुरूआती दिनों में बाजार में अस्थिरता देखने को मिली, लेकिन घरेलू कंपनियों को समर्थन देने वाले कदमों के चलते अब स्टॉक मार्केट में धीरे-धीरे स्थिरता लौट रही है। टेक्नोलॉजी और रक्षा क्षेत्र में सबसे अधिक उछाल देखा गया है।

कार्यकारी आदेशों की बौछार:
100 दिनों के भीतर ट्रंप ने 30 से अधिक कार्यकारी आदेश (Executive Orders) जारी किए हैं। इनमें पर्यावरण नियमों में ढील, सरकारी खर्चों में कटौती, शिक्षा और स्वास्थ्य नीति में संशोधन शामिल हैं। इन आदेशों को लेकर विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी ने तीखी आलोचना की है और इन्हें ‘लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की अनदेखी’ बताया है।

ट्रंप के 100 दिनों के कार्यकाल ने यह स्पष्ट कर दिया है कि उनका प्रशासन पारंपरिक तरीकों से अलग और तेज़ फैसलों की ओर झुका हुआ है। जहां एक ओर उनके समर्थक इसे निर्णायक नेतृत्व मानते हैं, वहीं विरोधी इसे विभाजनकारी और तानाशाही प्रवृत्ति करार दे रहे हैं।

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