यह कदम फ्रांस के हालिया निर्णय का प्रत्यक्ष जवाब माना जा रहा है, जिसमें पेरिस ने माली दूतावास के दो खुफिया अधिकारियों को निकाला था और दोनों देशों के बीच आतंकवाद-रोधी सहयोग को निलंबित कर दिया था। तनाव की जड़ें अगस्त में बामाको में एक फ्रांसीसी खुफिया अधिकारी की गिरफ्तारी से जुड़ी हैं, जिस पर माली की सेना के अधिकारियों के साथ तख्तापलट की साजिश रचने का आरोप लगा। माली ने फ्रांस को 72 घंटे के अंदर आरोपी को सौंपने की मांग ठुकरा दी थी।
बता दें कि माली लंबे समय से अल-कायदा और इस्लामिक स्टेट जैसे चरमपंथी समूहों की हिंसा से जूझ रहा है। दो सैन्य तख्तापलटों (2020 और 2021) के बाद, माली ने फ्रांसीसी सैनिकों को देश से बाहर कर रूस से सुरक्षा सहायता ली। हालांकि, फ्रांसीसी सेना की वापसी के बावजूद खुफिया सहयोग जारी था, जो अब पूरी तरह टूट गया है। हाल के महीनों में आतंकी हमलों में वृद्धि ने स्थिति को और जटिल बना दिया है।
माली, बुर्किना फासो और नाइजर जैसे साहेल क्षेत्र के देश फ्रांस के प्रभाव से दूर हो रहे हैं, जो वैश्विक शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकता है। फ्रांस की ओर से अभी कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम क्षेत्रीय स्थिरता के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है।