
यह पेज सपा के डिजिटल प्रचार का प्रमुख माध्यम था, जहां पार्टी की गतिविधियों, अखिलेश के बयानों और जनसंपर्क अभियानों को नियमित रूप से साझा किया जाता रहा है। लाखों फॉलोअर्स वाले इस पेज का अचानक बंद होना न केवल सपा कार्यकर्ताओं के लिए झटका है, बल्कि उत्तर प्रदेश की राजनीतिक गलियारों में भी चर्चा का विषय बन गया है।
सपा के आंतरिक सूत्रों के अनुसार, पेज बंद होने की सूचना मिलते ही पार्टी ने तत्काल फेसबुक को ईमेल के माध्यम से संपर्क किया। एक सूत्र ने बताया, "इस बारे में फेसबुक को ई-मेल भी किया गया, लेकिन उसका जवाब नहीं आया।" तकनीकी विशेषज्ञों का मानना है कि यह किसी ग्लिच की वजह से हो सकता है, लेकिन अधिक संभावना राजनीतिक साजिश की लग रही है। जानकारों का कहना है, "कंटेंट को लेकर किसी राजनीतिक विरोधी ने फेसबुक से शिकायत की होगी, तभी फेसबुक की ओर से इस तरह का एक्शन लिया जाता है।" फेसबुक की नीतियां ऐसी शिकायतों पर सख्ती बरतती हैं, जहां पोस्ट को भ्रामक या उल्लंघनकारी माना जाता है। हालांकि, सपा की ओर से कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है, न ही अखिलेश यादव ने व्यक्तिगत रूप से प्रतिक्रिया दी है।
यह घटना सपा के सोशल मीडिया रणनीति पर सवाल खड़े कर रही है। उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए, डिजिटल प्लेटफॉर्म पार्टी के लिए महत्वपूर्ण हथियार हैं। विपक्षी दलों द्वारा सपा पर लगातार हमले के बीच यह बंदी संदिग्ध लग रही है। क्या यह तकनीकी समस्या है या सुनियोजित षड्यंत्र? फेसबुक या मेटा से कोई स्पष्टीकरण न आने से रहस्य गहरा गया है।
सपा कार्यकर्ता अब वैकल्पिक प्लेटफॉर्मों जैसे एक्स (पूर्व ट्विटर) और इंस्टाग्राम पर सक्रिय हो रहे हैं, लेकिन फेसबुक पेज की बहाली का इंतजार कर रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषक इसे लोकतंत्र में डिजिटल स्वतंत्रता पर खतरे की घंटी बता रहे हैं। सपा नेतृत्व की ओर से जल्द कोई बड़ा ऐलान आ सकता है। यह घटना न केवल अखिलेश यादव की छवि को प्रभावित करेगी, बल्कि पूरे विपक्षी खेमे में हलचल मचा सकती है।
सपा के आंतरिक सूत्रों के अनुसार, पेज बंद होने की सूचना मिलते ही पार्टी ने तत्काल फेसबुक को ईमेल के माध्यम से संपर्क किया। एक सूत्र ने बताया, "इस बारे में फेसबुक को ई-मेल भी किया गया, लेकिन उसका जवाब नहीं आया।" तकनीकी विशेषज्ञों का मानना है कि यह किसी ग्लिच की वजह से हो सकता है, लेकिन अधिक संभावना राजनीतिक साजिश की लग रही है। जानकारों का कहना है, "कंटेंट को लेकर किसी राजनीतिक विरोधी ने फेसबुक से शिकायत की होगी, तभी फेसबुक की ओर से इस तरह का एक्शन लिया जाता है।" फेसबुक की नीतियां ऐसी शिकायतों पर सख्ती बरतती हैं, जहां पोस्ट को भ्रामक या उल्लंघनकारी माना जाता है। हालांकि, सपा की ओर से कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है, न ही अखिलेश यादव ने व्यक्तिगत रूप से प्रतिक्रिया दी है।
यह घटना सपा के सोशल मीडिया रणनीति पर सवाल खड़े कर रही है। उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए, डिजिटल प्लेटफॉर्म पार्टी के लिए महत्वपूर्ण हथियार हैं। विपक्षी दलों द्वारा सपा पर लगातार हमले के बीच यह बंदी संदिग्ध लग रही है। क्या यह तकनीकी समस्या है या सुनियोजित षड्यंत्र? फेसबुक या मेटा से कोई स्पष्टीकरण न आने से रहस्य गहरा गया है।
सपा कार्यकर्ता अब वैकल्पिक प्लेटफॉर्मों जैसे एक्स (पूर्व ट्विटर) और इंस्टाग्राम पर सक्रिय हो रहे हैं, लेकिन फेसबुक पेज की बहाली का इंतजार कर रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषक इसे लोकतंत्र में डिजिटल स्वतंत्रता पर खतरे की घंटी बता रहे हैं। सपा नेतृत्व की ओर से जल्द कोई बड़ा ऐलान आ सकता है। यह घटना न केवल अखिलेश यादव की छवि को प्रभावित करेगी, बल्कि पूरे विपक्षी खेमे में हलचल मचा सकती है।