राजीव रंजन ने 19 साल बाद छोड़ा NDTV, नया डिजिटल प्लेटफॉर्म BharatDefX किया लॉन्च

भारतीय टेलीविजन पत्रकारिता और रक्षा रिपोर्टिंग के क्षेत्र में एक नए युग की शुरुआत हो चुकी है। देश के प्रमुख रक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा मामलों के वरिष्ठ पत्रकार राजीव रंजन ने एनडीटीवी इंडिया के साथ अपने करीब 19 वर्षों के लंबे जुड़ाव को खत्म करने के बाद बड़ा फैसला किया है। मुख्यधारा के टेलीविजन मीडिया में करीब दो दशकों तक अपनी धाक जमाने के बाद अब उन्होंने डिजिटल दुनिया का रुख किया है। राजीव रंजन का यह कदम सिर्फ एक पत्रकार द्वारा संस्थान बदलने की सामान्य घटना नहीं है, बल्कि यह हिंदी रक्षा पत्रकारिता के क्षेत्र में एक बड़े डिजिटल बदलाव का प्रतीक माना जा रहा है।

राजीव रंजन ने 19 साल बाद छोड़ा NDTV, नया डिजिटल प्लेटफॉर्म BharatDefX किया लॉन्च

राजीव रंजन ने अपने सोशल मीडिया हैंडल्स और वीडियो संदेश के जरिए दर्शकों से सीधा संवाद स्थापित करते हुए इस बात की जानकारी साझा की। उन्होंने बेहद सहज और साफगोई से अपने दर्शकों को संबोधित करते हुए कहा कि वे हमेशा से खबर के प्रति जवाबदेह इंसान रहे हैं, इसलिए इस बड़े फैसले को अपने दर्शकों से छुपाना उनके लिए संभव नहीं था। उन्होंने इस निर्णय को अप्रत्याशित बताते हुए स्वीकार किया कि परिस्थितियों के बदलने के कारण यह आगे बढ़ने का सही समय था। अब उनका पूरा ध्यान और ऊर्जा उनके अपने नए डिजिटल वेंचर BharatDefX को मजबूत बनाने में लगेगी।

हिंदी रक्षा रिपोर्टिंग की नींव और 'वतन के रखवाले' का गौरवशाली इतिहास

राजीव रंजन की पहचान सिर्फ एक पत्रकार की नहीं, बल्कि हिंदी मीडिया में रक्षा पत्रकारिता को एक नई मुकाम और सम्मान दिलाने वाले प्रणेता के रूप में होती है। अपने वीडियो संदेश में उन्होंने एनडीटीवी के साथ बिताए गए वर्षों और विशेष रूप से अपने चर्चित कार्यक्रम “वतन के रखवाले” का विशेष रूप से उल्लेख किया। राजीव रंजन ने बताया कि वर्ष 2007-08 के दौर में हिंदी न्यूज़ चैनलों पर सैन्य और सुरक्षा मामलों पर कोई समर्पित शो बनाना एक बहुत बड़ी चुनौती हुआ करता था।

उस समय पूरा रक्षा तंत्र और सैन्य अधिकारी अंग्रेजी भाषा में ही बातचीत करने के अभ्यस्त थे। रक्षा मंत्रालय और तीनों सेनाओं का माहौल भी काफी हद तक अंग्रेजी केंद्रित था, जहाँ हिंदी में इस तरह के तकनीकी विषयों को पेश करने को संशय की नजर से देखा जाता था। सैन्य अधिकारी भी कैमरे के सामने हिंदी में विचार रखने में झिझक महसूस करते थे। इस चुनौती को स्वीकार करते हुए राजीव रंजन ने बेहद सरल और आम भाषा में देश के सुरक्षा तंत्र की बारीकियों को देश के हर कोने तक पहुँचाने का बीड़ा उठाया। “वतन के रखवाले” ने न सिर्फ दर्शकों के दिलों में जगह बनाई बल्कि हिंदी में गंभीर रक्षा रिपोर्टिंग के लिए एक मानक भी तय किया।

1990 के दशक से पत्रकारिता का सफर: ग्राउंड ज़ीरो की मजबूत बुनियाद

राजीव रंजन की पत्रकारिता की जड़ें ज़मीनी हकीकत से जुड़ी हुई हैं। उनके इस लंबे और सफल करियर की शुरुआत वर्ष 1994-95 में प्रतिष्ठित संस्थान इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन (IIMC) से पढ़ाई पूरी करने के साथ हुई थी। इसके तुरंत बाद उन्हें भारतीय मीडिया के जाने-माने दिग्गज दिवंगत पत्रकार विनोद दुआ के साथ 'द कम्युनिकेशन ग्रुप' में काम करने का अवसर मिला। यहाँ उन्होंने रिपोर्टिंग के कड़े अनुशासन, तथ्यात्मकता और बुनियादी सिद्धांतों का गहरा अध्ययन किया।

इसके बाद उन्होंने दूरदर्शन के लिए कई चर्चित खोजी कार्यक्रमों का निर्माण किया, जिसमें “खोज-खबर” जैसी लोकप्रिय धारावाहिक श्रृंखलाएं शामिल थीं। लेकिन राजीव रंजन के पेशेवर जीवन में सबसे महत्वपूर्ण और बड़ा मोड़ वर्ष 1999 में आया, जब वे न्यूज़ एजेंसी एएनआई (ANI) से जुड़े और उनकी तैनाती जम्मू-कश्मीर में हुई।

जम्मू-कश्मीर की ग्राउंड रिपोर्टिंग: आतंकवाद से लेकर इंसानी संवेदनाओं तक

जम्मू-कश्मीर में एएनआई के प्रतिनिधि के रूप में बिताए गए साढ़े तीन साल राजीव रंजन के पत्रकारिता करियर का सबसे संवेदनशील और अहम दौर साबित हुए। उस दौर में जब कश्मीर में आतंकवाद अपने चरम पर था, उन्होंने सिर्फ गोलियों और मुठभेड़ों की खबरों तक खुद को सीमित नहीं रखा। उन्होंने घाटी के आम नागरिकों की पीड़ा, दूर-दराज के इलाकों में तैनात जवानों के कठिन जीवन और क्षेत्र की बुनियादी समस्याओं पर ध्यान केंद्रित किया।

इसी दौरान उन्होंने जम्मू संभाग के डोडा जिले के एक अति-पिछड़े और दुर्गम गाँव 'डेडकाई' का दौर किया। यह गाँव इस बात के लिए जाना जाता था कि वहाँ की 40 प्रतिशत से अधिक आबादी जन्मजात मूक और बधिर थी। उस खौफनाक और आतंक प्रभावित इलाके में जाकर उन्होंने जान जोखिम में डालकर इस मानवीय त्रासदी पर विस्तृत रिपोर्ट तैयार की। इस ज़मीनी रिपोर्ट के प्रसारित होने के बाद शासन-प्रशासन की नींद खुली और केंद्र व राज्य सरकार की कल्याणकारी योजनाएं उस दूरस्थ गाँव तक पहुँच सकीं।

जम्मू-कश्मीर में रहते हुए राजीव रंजन ने उस दौर की हर बड़ी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय घटना को बेहद करीब से देखा और कवर किया। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का ऐतिहासिक कुपवाड़ा दौरा हो, भारत-पाकिस्तान सीमा पर महीनों चला विशाल सैन्य जमावड़ा 'ऑपरेशन पराक्रम' हो, या फिर श्रीनगर में हिजबुल मुजाहिदीन के साथ हुई ऐतिहासिक सीजफायर वार्ता—इन सभी ऐतिहासिक मोड़ों पर वे ज़मीन से सीधी और सटीक रिपोर्टिंग कर रहे थे।

सहारा समय का डिफेंस डायरी और NDTV का स्वर्णिम दौर

एएनआई में शानदार काम करने के बाद राजीव रंजन 'सहारा समय' न्यूज़ चैनल से जुड़े। वहाँ उन्होंने रक्षा मामलों पर आधारित एक नया प्रयोग करते हुए “डिफेंस डायरी” नामक कार्यक्रम की शुरुआत की। इस शो की खासियत यह थी कि इसमें गंभीर सुरक्षा मुद्दों के साथ-साथ सेना के अनुशासन, उनके सांस्कृतिक जीवन और हल्के-फुल्के सकारात्मक पहलुओं को भी प्राथमिकता दी जाती थी।

इसके पश्चात एनडीटीवी में उनके 19 वर्षों के कार्यकाल ने उन्हें देश के सबसे विश्वसनीय रक्षा पत्रकारों की सूची में शीर्ष पर ला खड़ा किया। एनडीटीवी के माध्यम से उन्होंने अपने दर्शकों को देश के सबसे चुनौतीपूर्ण और खतरनाक इलाकों की सीधी सैर कराई। एसी स्टूडियो में बैठकर ज्ञान देने के बजाय राजीव रंजन ने सियाचिन ग्लेशियर की माइनस 40 डिग्री ठंड में जाकर रिपोर्टिंग की। लाइन ऑफ कंट्रोल (LoC) के अग्रिम बंकरों, कुपवाड़ा के घने जंगलों, अंडमान-निकोबार के नौसैनिक अड्डों से लेकर बेलगाम के कठिन कमांडो ट्रेनिंग कोर्स तक वे खुद पहुँचे।

इतना ही नहीं, मिजोरम के काउंटर इंसर्जेंसी एंड जंगल वॉरफेयर स्कूल (CIJWS) में सैन्य रणनीतियों को समझना हो, भारतीय नौसेना के विशाल विमानवाहक पोतों (Aircraft Carriers) पर हफ्तों बिताना हो या फिर हर साल 26 जनवरी को राजपथ पर निकलने वाली विभिन्न सैन्य रेजिमेंटों की गाथाएं सुनानी हों—राजीव रंजन ने हर विषय को दर्शकों तक निष्पक्षता से पहुँचाया। कारगिल युद्ध के 25 साल पूरे होने पर उन्होंने जिस तरह से वीर नारियों, युद्ध के योद्धाओं और परमवीर चक्र विजेताओं के साक्षात्कार किए, उसने देशवासियों को 15,000 फीट की ऊँचाई पर लड़ी गई जंग की भयावहता और वीरता से दोबारा रूबरू कराया।

क्यों चुना टीवी छोड़कर डिजिटल मीडिया का रास्ता?

आज के दौर में जब हर मुख्यधारा का पत्रकार टीवी की चमक-धमक का मोह नहीं छोड़ पाता, ऐसे में राजीव रंजन का डिजिटल मीडिया का रुख करना एक बड़ा विचारणीय प्रश्न खड़ा करता है। इसका उत्तर देते हुए उन्होंने भारतीय टीवी न्यूज़ चैनलों के बदलते स्वरूप और रक्षा खबरों को लेकर घटती प्राथमिकताओं पर चिंता जताई।

राजीव रंजन के अनुसार, मौजूदा दौर के टेलीविजन न्यूज़ चैनलों पर रक्षा, आंतरिक सुरक्षा और सामरिक मुद्दों के लिए समय (Space) लगातार कम होता जा रहा है। टीवी पर अब सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर चर्चा केवल तभी देखने को मिलती है जब कोई बड़ी अप्रिय घटना घट जाए, जैसे अमेरिका-ईरान का सैन्य टकराव, रूस-यूक्रेन युद्ध या फिर कोई फाइटर जेट क्रैश हो जाए। नियमित रूप से राष्ट्रीय सुरक्षा और सैन्य तैयारियों पर गंभीर और विश्लेषणात्मक सामग्री दिखाने का धैर्य अब पारंपरिक टीवी मीडिया के पास नहीं बचा है। इसी खालीपन को भरने और दर्शकों तक बिना सनसनी फैलाए सच्ची जानकारी पहुँचाने के लिए उन्होंने BharatDefX की स्थापना की है।

क्या है BharatDefX और दर्शकों को इसमें क्या खास मिलेगा?

BharatDefX एक ऐसा डिजिटल प्लेटफॉर्म है जो पूरी तरह से रक्षा मामलों, राष्ट्रीय सुरक्षा, सैन्य तकनीक और भू-राजनीति (Geopolitics) पर केंद्रित होगा। राजीव रंजन ने दर्शकों को आश्वस्त किया है कि इस प्लेटफॉर्म पर मिलने वाला हर कंटेंट पूरी तरह से तथ्यात्मक, निष्पक्ष और ईमानदारी पर आधारित होगा।

अपने लंबे अनुभव का हवाला देते हुए राजीव रंजन ने गर्व से कहा कि उन्होंने अपने पूरे पत्रकारिता जीवन में कभी कोई ऐसी खबर नहीं की जिस पर उन्हें बाद में पछतावा हुआ हो। एनडीटीवी में बिताए गए 19 सालों के दौरान उनकी एक भी खबर गलत या गुमराह करने वाली साबित नहीं हुई। यही ईमानदारी और विश्वसनीयता अब BharatDefX का मूल मंत्र बनेगी।

BharatDefX पर दर्शकों को निम्नलिखित विशेष सामग्री देखने को मिलेगी:
  • साप्ताहिक रक्षा विश्लेषण और एक्सप्लेनर्स: राष्ट्रीय सुरक्षा, नए रक्षा सौदों, स्वदेशी हथियारों और सैन्य तकनीक पर बेहद सरल भाषा में तैयार किए गए विस्तृत वीडियो एक्सप्लेनर्स।
  • अनुभवी दिग्गजों और सैनिकों की कहानियां: परमवीर चक्र विजेताओं, सेवानिवृत्त शीर्ष सैन्य अधिकारियों (Veterans) और मैदान-ए-जंग में तैनात जवानों की अनसुनी दास्तानें और उनके अनुभव।
  • गहन जियो-पॉलिटिकल चर्चाएँ: भारत के पड़ोसी देशों—पाकिस्तान, बांग्लादेश, चीन—के साथ-साथ अमेरिका, रूस और मध्य पूर्व के देशों में हो रही हलचलों का भारत की सुरक्षा पर क्या प्रभाव पड़ेगा, इसका सीधा और तथ्यपरक विश्लेषण।
  • विश्वसनीय ग्राउंड रिपोर्टिंग: केवल कमरों में बैठकर राय बनाने के बजाय ज़मीन पर जाकर विशेषज्ञों की मदद से तैयार की गई शोधपरक रिपोर्टें।

हिंदी रक्षा पत्रकारिता के क्षेत्र में एक नए अध्याय का आगाज़

राजीव रंजन का यह कदम स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि आधुनिक मीडिया का केंद्र अब पारंपरिक टेलीविजन से हटकर डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की ओर तेजी से शिफ्ट हो रहा है। आज का जागरूक दर्शक वर्ग केवल टीआरपी-संचालित चिल्लाहट वाली बहसें नहीं देखना चाहता, बल्कि उसे विषय-विशेषज्ञों से सटीक, तथ्यपरक और गंभीर जानकारी की तलाश है।

अपनी बात का अंत करते हुए राजीव रंजन ने अपने सभी पुराने और नए दर्शकों से अपील की कि वे BharatDefX से जुड़ें, इसे सब्सक्राइब करें और अपना समर्थन दें। उन्होंने बेहद भावुक अंदाज में कहा, “मेरा पता और मेरा मंच भले ही बदल गया है, लेकिन मैं आज भी वही पुराना राजीव रंजन हूँ, जिसके लिए पत्रकारिता और खबर कोई व्यापार या पेशा नहीं, बल्कि दिल से जुड़ा एक जुनून है।”

दर्शकों और मीडिया विश्लेषकों का मानना है कि राजीव रंजन का यह नया सफर न केवल हिंदी में रक्षा पत्रकारिता के स्तर को एक नई ऊँचाई देगा, बल्कि स्वतंत्रता और गुणवत्ता चाहने वाले वरिष्ठ पत्रकारों के लिए डिजिटल मीडिया के रास्ते नए द्वार भी खोलेगा।

A K

Founding Editor

एक टिप्पणी भेजें

और नया पुराने