6 साल तक बेगुनाह को जेल में सड़ने पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, UP सरकार को 6 लाख मुआवजे का आदेश

देश की न्याय प्रणाली और पुलिस जांच व्यवस्था की कमियों को उजागर करने वाला एक बेहद अहम और कड़ा फैसला सुप्रीम कोर्ट से सामने आया है। उत्तर प्रदेश के आगरा जिले से जुड़े एक गंभीर आपराधिक मामले की सुनवाई करते हुए देश की सर्वोच्च अदालत ने राज्य सरकार को स्पष्ट निर्देश दिया है कि वह अरुण दीपक नाम के निर्दोष व्यक्ति को 6 लाख रुपये का मुआवजा प्रदान करे। अदालत ने इस मामले को न्याय का उपहास करार देते हुए माना कि बिना किसी बुनियादी सबूत और मनगढ़ंत कहानी के आधार पर एक बेगुनाह नागरिक के जीवन के 6 अनमोल साल सलाखों के पीछे बर्बाद कर दिए गए।

Supreme Court UP Police Compensation: बिना सबूत 6 साल जेल में सड़ा युवक, सुप्रीम कोर्ट ने UP सरकार पर लगाया 6 लाख का जुर्माना

न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने इस मामले पर फैसला सुनाते हुए राज्य पुलिस और अभियोजन पक्ष की कार्यप्रणाली की कड़ी आलोचना की। शीर्ष अदालत ने कहा कि पुलिस की यह लचर और लापरवाह जांच यह साबित करती है कि किसी आपराधिक मामले की जांच कैसे नहीं की जानी चाहिए। अदालत ने माना कि बुनियादी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन न किए जाने की वजह से एक व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और जीवन के मौलिक अधिकार का गंभीर हनन हुआ है।

जानिए क्या था 2019 का आगरा अपहरण और हत्या का पूरा मामला

इस पूरे मामले की शुरुआत अक्टूबर 2019 में उत्तर प्रदेश के आगरा जिले के अछनेरा थाना क्षेत्र में दर्ज एक प्राथमिकी से हुई थी। पुलिस ने अपहरण, हत्या और साक्ष्य मिटाने के आरोप में भारतीय दंड संहिता की धारा 364, 302 और 201 के तहत मुकदमा दर्ज किया था। इसके बाद 14 नवंबर 2019 को पुलिस ने अरुण दीपक को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। तब से लेकर वर्ष 2026 तक वह विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में ही बंद रहा।

दिलचस्प और चौंकाने वाली बात यह है कि शुरुआती एफआईआर और शिकायतकर्ता के बयानों में अरुण दीपक का नाम तक शामिल नहीं था। बाद में पुलिस ने संदिग्ध सीसीटीवी फुटेज और एक सह-आरोपी के कथित कबूलनामे के आधार पर उसे इस गंभीर अपराध में घसीट लिया। मुकदमे की सुनवाई के दौरान मुख्य सह-आरोपी की मौत हो गई, जबकि एक अन्य आरोपी महिला फरार रही। इस तरह अरुण दीपक अकेला ऐसा आरोपी बचा, जिसने अकेले इस पूरे मुकदमे की त्रासदी को झेला।

बिना सबूत और कमजोर साक्ष्यों पर टिकी थी यूपी पुलिस की मनगढ़ंत कहानी

सुप्रीम कोर्ट ने जब इस मामले के संपूर्ण रिकॉर्ड का अध्ययन किया, तो पुलिस जांच की पोल खुलकर सामने आ गई। अदालत ने पाया कि पुलिस जिस सीसीटीवी फुटेज को मुख्य सबूत मानकर चल रही थी, वह बेहद धुंधली थी और भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65बी के तहत अनिवार्य प्रमाण पत्र के बिना पेश की गई थी। इसके अलावा कॉल डिटेल रिकॉर्ड्स के लिए भी आवश्यक कानूनी प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया था।

मामले की जांच करने वाले सब-इंस्पेक्टर भी अदालत में यह साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहे कि शिकायतकर्ता ने आरोपी की पहचान की थी या नहीं। पुलिस ने अदालत के सामने एक फिरौती मांगने का दावा भी पेश किया था, लेकिन कोर्ट ने नोट किया कि इस फिरौती की कोई शिकायत कभी दर्ज ही नहीं कराई गई थी। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि पूरी कहानी सिर्फ अनुमानों और अटकलों पर गढ़ी गई थी, जिसमें जांच का बुनियादी स्तर तक नहीं अपनाया गया था।

सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी: जांच का उद्देश्य सिर्फ सजा दिलाना नहीं

न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन द्वारा लिखे गए इस ऐतिहासिक निर्णय में कहा गया कि राज्य अपनी जिम्मेदारियों से मुंह नहीं मोड़ सकता, विशेषकर तब जब किसी आपराधिक मामले में आरोपी को तब तक निर्दोष माना जाता है जब तक कि उसका अपराध सिद्ध न हो जाए। अदालत ने याद दिलाया कि जांच एजेंसियां और अभियोजन पक्ष केवल किसी भी तरह से सजा कराने के लिए नहीं बने हैं, बल्कि वे न्याय प्रणाली का एक बेहद अहम हिस्सा हैं।

अदालत ने कहा कि जांच एजेंसियों का यह कर्तव्य है कि वे केवल पीड़ित या शिकायतकर्ता के लिए ही नहीं, बल्कि आरोपी के लिए भी निष्पक्ष न्याय सुनिश्चित करें। अदालत ने गहरा दुख जताते हुए कहा कि ऐसे मामलों में जहां न्याय का इतना बड़ा उपहास होता है, वहां उस व्यक्ति को क्षतिपूर्ति देना बेहद जरूरी हो जाता है जो खुद इस लचर व्यवस्था का शिकार बन गया है।

डीजीपी और गृह सचिव को निर्देश, एक महीने में मुआवजा न देने पर लगेगा 18 प्रतिशत ब्याज

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक और गृह सचिव को फैसले की प्रति भेजने का आदेश दिया है। शीर्ष अदालत ने राज्य पुलिस को सलाह दी है कि वे अपने अधिकारियों को जांच की सही, वैज्ञानिक और कानूनी प्रक्रिया के प्रति जागरूक और शिक्षित करें ताकि भविष्य में किसी अन्य बेगुनाह की जिंदगी इस तरह बर्बाद न हो।

इसके साथ ही अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार को आदेश दिया है कि वह अरुण दीपक को एक महीने के भीतर 6 लाख रुपये की मुआवजा राशि का भुगतान करे। सर्वोच्च अदालत ने यह भी साफ कर दिया है कि यदि राज्य सरकार निर्धारित सीमा के भीतर इस राशि का भुगतान करने में विफल रहती है, तो उसे 18 प्रतिशत वार्षिक दर के भारी ब्याज के साथ इस राशि का भुगतान करना होगा।

मानवाधिकार और विचाराधीन कैदियों के लिए नजीर बना यह ऐतिहासिक फैसला

सुप्रीम कोर्ट का यह रुख देश भर की पुलिस व्यवस्था और न्याय प्रणाली के लिए एक बड़ा संदेश है। अक्सर देखा जाता है कि पुलिसिया ढिलाई और अधूरी जांच के कारण हजारों विचाराधीन कैदी सालों तक जेलों में बंद रहते हैं। जब सालों बाद वे बरी होते हैं, तो उनकी जिंदगी के सबसे महत्वपूर्ण साल बीत चुके होते हैं।

शीर्ष अदालत द्वारा मुआवजा तय करने का यह निर्णय यह स्पष्ट करता है कि बिना किसी सबूत के किसी नागरिक की आजादी छीनना राज्य के लिए भी भारी पड़ सकता है। यह फैसला भविष्य में पुलिस जांच में पारदर्शिता लाने और बेगुनाह लोगों के मानवाधिकारों की रक्षा करने में एक मील का पत्थर साबित होगा।

स्रोत (Source)

इस प्रसंग से जुड़ी विस्तृत और मूल कानूनी रिपोर्ट LiveLaw पर पढ़ी जा सकती है।

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