कृषि शिक्षा की नई दिशा: केवल डिग्री बांटने से नहीं, किसानों की खुशहाली से तय होगी सफलता

नई दिल्ली में देश भर के कृषि विश्वविद्यालयों के कुलपतियों का 36वां दो दिवसीय वार्षिक सम्मेलन 25 अगस्त 2026 से आरंभ हुआ। विकसित भारत @2047 के लिए कृषि उच्च शिक्षा की पुनर्कल्पना विषय पर आधारित इस आयोजन का उद्घाटन केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण और ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने किया। इस मंच पर केंद्रीय राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी, राम नाथ ठाकुर, आईसीएआर के महानिदेशक डॉ. एम. एल. जाट और देश भर से आए शीर्ष कृषि वैज्ञानिक एकत्र हुए। सम्मेलन का मुख्य संदेश स्पष्ट था कि भारतीय कृषि शिक्षा का लक्ष्य कागजी डिग्रियों से आगे बढ़कर ग्रामीण जमीन पर वास्तविक परिवर्तन लाना है।

कृषि शिक्षा का असर डिग्रियों से नहीं किसानों के सुधार से तय होगा: शिवराज सिंह चौहान
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केवल डिग्रियों की गिनती से नहीं, जमीनी प्रभाव से तय होगी सफलता

केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने उद्घाटन सत्र में स्पष्ट कहा कि कृषि विश्वविद्यालयों के प्रदर्शन का मूल्यांकन इस बात से नहीं होना चाहिए कि वे हर साल कितने स्नातक तैयार करते हैं। असली मानदंड यह है कि उनकी शोध और शिक्षण व्यवस्था से किसानों के जीवन में कितना सकारात्मक बदलाव आया है। कृषि शिक्षा को प्रयोगशालाओं की चारदीवारी से बाहर निकलकर सीधे खेत-खलिहानों तक पहुंचना होगा। वैज्ञानिक अनुसंधानों को ऐसे व्यवहार्य और सुलभ समाधानों में बदलना जरूरी है जिन्हें एक साधारण किसान आसानी से अपने खेत में अपना सके।

नौकरी मांगने वाले नहीं, रोजगार देने वाले बनें युवा

सम्मेलन में इस बात पर जोर दिया गया कि देश के कृषि स्नातक केवल सरकारी नौकरी के भरोसे न रहें, बल्कि वे कृषि-उद्यमी, नवप्रवर्तक और रोजगार सृजनकर्ता के रूप में अपनी पहचान बनाएं। केंद्रीय मंत्री ने आग्रह किया कि कृषि विश्वविद्यालयों, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर), कृषि विज्ञान केंद्रों (केवीके) और किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) के बीच एक मजबूत तालमेल बनाया जाए। इससे तकनीकी नवाचार, एग्री-स्टार्टअप और आधुनिक खेती के तरीकों को सीधे बाजार से जोड़ा जा सकेगा। प्रत्येक सम्मेलन को केवल औपचारिक बैठकों तक सीमित रखने के बजाय स्पष्ट संकल्प, व्यावहारिक कार्य योजना और मापने योग्य परिणामों पर केंद्रित होना चाहिए।

आत्मनिर्भरता से आगे बढ़कर भविष्य की कृषि की तैयारी

कृषि राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी और राम नाथ ठाकुर ने भारत की खाद्यान्न आत्मनिर्भरता की यात्रा में किसानों और वैज्ञानिकों के अमूल्य योगदान को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि भारत अब खाद्यान्न की कमी वाले दौर से बहुत आगे निकल चुका है और अब समय कृषि को अत्याधुनिक तकनीक आधारित बनाने का है। युवाओं को खेती की ओर आकर्षित करने के लिए इसमें आधुनिक अनुसंधान, डिजिटल टूल्स और लाभदायक कृषि व्यवसाय के अवसर तैयार करने होंगे। इसके साथ ही, प्राकृतिक खेती, मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन और जलवायु-अनुकूल खेती के तरीकों को प्राथमिकता देने का आह्वान किया गया ताकि छोटे और सीमांत किसानों की आय में वृद्धि हो सके।

उद्योग और अकादमिक क्षेत्र का एकीकरण और संरचनात्मक सुधार

आईसीएआर के महानिदेशक डॉ. एम.एल. जाट ने अपने संबोधन में बताया कि पारंपरिक कृषि शिक्षा मॉडल को एक आधुनिक, कौशल-संचालित और नवाचार-आधारित इकोसिस्टम में बदलना अब समय की मांग है। सम्मेलन के पांचों सत्रों में 14 प्रमुख एजेंडा बिंदुओं पर गहन विचार-विमर्श किया जा रहा है। इनमें कृषि शिक्षा में प्रोफ़ेसर ऑफ़ प्रैक्टिस की नियुक्ति, समयबद्ध प्रवेश प्रणाली, मान्यता मानकों को मजबूत करना, और कृषि-योग्य एवं हिंदी माध्यम के छात्रों के लिए स्नातक पात्रता जैसे सुधार शामिल हैं।

इसके अतिरिक्त, ग्रामीण कृषि कार्य अनुभव (RAWEE) को अधिक व्यावहारिक बनाने, डेटा-संचालित निर्णय प्रणाली विकसित करने और उद्योग-अकादमिक साझेदारी के माध्यम से इंटर्नशिप को बढ़ावा देने पर भी सहमति जताई गई। सम्मेलन में यह संकल्प लिया गया कि साक्ष्य-आधारित योजनाओं और परिणाम-उन्मुख शोध के बल पर 2047 तक भारत के कृषि क्षेत्र को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी और पूरी तरह से टिकाऊ बनाया जाएगा।

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