Bhagat Singh 119th Birth Anniversary: शहीद-ए-आजम भगत सिंह की अनदेखी दास्तान, जाने आज क्यों प्रासंगिक हैं उनके विचार

विशेष समाचार रिपोर्ट संवाददाता | नई दिल्ली

ऐतिहासिक दस्तावेज: 119वीं जयंती पर विशेष — क्रांति के महानायक शहीद-ए-आजम भगत सिंह: जीवन, प्रामाणिक आंकड़े और आधुनिक भारत में प्रासंगिकता

"सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है ज़ोर कितना बाज़ू-ए-कातिल में है।"

नई दिल्ली: 28 सितंबर को संपूर्ण राष्ट्र भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अमर नायक शहीद-ए-आजम भगत सिंह की 119वीं जयंती मना रहा है। 28 सितंबर 1907 को अविभाजित भारत में जन्मे भगत सिंह ने मात्र 23 वर्ष, 5 महीने और 23 दिन की अल्पायु में 23 मार्च 1931 को हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूमकर इतिहास रचा था।

वे केवल एक सशस्त्र क्रांतिकारी नहीं थे, बल्कि एक प्रखर लेखक, बहुभाषाविद, समाजशास्त्री और दूरदर्शी राजनीतिक चिंतक थे। देश भर में आयोजित विशेष कार्यक्रमों के बीच प्रस्तुत है भगत सिंह के जीवन-वृत्त, क्रांतिकारी घटनाओं, जेल संघर्ष और उनके विचारों की एक विस्तृत व प्रामाणिक समाचार रिपोर्ट।


1. प्रमुख तथ्य एवं आंकड़े (Fact Sheet)

विषय प्रामाणिक विवरण / ऐतिहासिक आंकड़ा
जन्म तिथि व स्थान 28 सितंबर 1907; बंगा गांव, जिला लायलपुर (पंजाब, वर्तमान पाकिस्तान)
पारिवारिक पृष्ठभूमि पिता सरदार किशन सिंह, माता विद्यावती
मुख्य क्रांतिकारी संगठन नौजवान भारत सभा (मार्च 1926), एचएसआरए (सितंबर 1928)
सांडर्स वध की तिथि 17 दिसंबर 1928 (लाहौर)
असेंबली बम कांड 8 अप्रैल 1929 (दिल्ली सेंट्रल असेंबली)
ऐतिहासिक भूख हड़ताल 14 जून 1929 से शुरू (63वें दिन जतिन दास शहीद)
प्रसिद्ध निबंध "मैं नास्तिक क्यों हूं?" (अक्टूबर 1930 में जेल में रचित)
शहादत की तिथि व समय 23 मार्च 1931, शाम 7:33 बजे (लाहौर सेंट्रल जेल)

2. प्रारंभिक जीवन और देशभक्ति की विरासत

भगत सिंह का जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ था जहां स्वतंत्रता संग्राम का माहौल पहले से मौजूद था। उनके जन्म के दिन ही उनके पिता किशन सिंह और उनके दो चाचा—अजीत सिंह व स्वर्ण सिंह—ब्रिटिश जेलों से रिहा होकर घर लौटे थे। इसी कारण उनकी दादी ने उन्हें 'भागंवाला' (भाग्यशाली बालक) कहा था।

  • पिता किशन सिंह: स्वतंत्रता सेनानी थे और किसान आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाते थे।
  • चाचा अजीत सिंह: प्रसिद्ध 'पगड़ी संभाल जट्टा' आंदोलन के मुख्य नेता थे, जिन्हें अंग्रेजों ने देशनिकाला दिया था।
  • चाचा स्वर्ण सिंह: कम आयु में ही ब्रिटिश जेल की कठोर यातनाओं के कारण अस्वस्थ होकर शहीद हो गए थे।

3. जलियांवाला बाग और वैचारिक मोड़ (1919 – 1928)

[13 अप्रैल 1919] जलियांवाला बाग → [1921-22] असहयोग आंदोलन → [मार्च 1926] नौजवान भारत सभा → [सितंबर 1928] एचएसआरए

जलियांवाला बाग का प्रभाव (13 अप्रैल 1919)

12 वर्ष की आयु में बालक भगत सिंह अमृतसर के जलियांवाला बाग पहुंचे और निर्दोष भारतीयों के खून से सनी मिट्टी को कांच की शीशी में भरकर घर ले आए। इस घटना ने उनके मन में ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ आजादी की अलख जगाई।

असहयोग आंदोलन और मोहभंग (1921–1922)

1921 में महात्मा गांधी के आह्वान पर उन्होंने विदेशी कपड़ों की होली जलाई और पढ़ाई छोड़ दी। हालांकि, 1922 में चौरी-चौरा कांड के बाद आंदोलन अचानक वापस लिए जाने पर युवा भगत सिंह का अहिंसक तरीकों से मोहभंग हुआ और वे सशस्त्र क्रांति की ओर मुड़े।

क्रांतिकारी संगठनों की स्थापना

  • नौजवान भारत सभा (मार्च 1926): युवाओं में धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद और वैज्ञानिक दृष्टिकोण जगाने के लिए लाहौर में इस संगठन का गठन किया गया।
  • हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन - एचएसआरए (सितंबर 1928): दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान में क्रांतिकारियों की बैठक में संगठन के नाम में भगत सिंह के आग्रह पर 'सोशलिस्ट' (समाजवादी) शब्द जोड़ा गया, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि लक्ष्य केवल अंग्रेजों को भगाना नहीं, बल्कि शोषणमुक्त समाज बनाना है।

4. सांडर्स वध और सेंट्रल असेंबली बम कांड

सांडर्स का वध (17 दिसंबर 1928)

30 अक्टूबर 1928 को लाहौर में साइमन कमीशन के खिलाफ शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे लाला लाजपत राय पर पुलिस अधीक्षक जे.ए. स्कॉट के आदेश पर बर्बर लाठीचार्ज हुआ। 17 नवंबर 1928 को लालाजी का निधन हो गया।

एचएसआरए ने लालाजी की मृत्यु का बदला लेने के लिए स्कॉट को मारने की योजना बनाई। लेकिन 17 दिसंबर 1928 को लाहौर पुलिस मुख्यालय के बाहर गलती से सहायक पुलिस अधीक्षक जॉन पी. सांडर्स सामने आ गया। शिवराम राजगुरु ने पहली गोली चलाई और भगत सिंह ने आगे बढ़कर सांडर्स पर गोलियां चला दीं।

दिल्ली असेंबली बम कांड (8 अप्रैल 1929)

ब्रिटिश सरकार दो काले कानून पारित कराने की कोशिश में थी:

  1. व्यापार विवाद विधेयक (ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल) – मजदूरों के हड़ताल करने के अधिकार को छीनने वाला।
  2. जन सुरक्षा विधेयक (पब्लिक सेफ्टी बिल) – क्रांतिकारियों को बिना मुकदमा चलाए जेल में डालने वाला।

8 अप्रैल 1929 को दिल्ली की सेंट्रल असेंबली (वर्तमान संसद भवन) में भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने खाली जगह पर दो कम तीव्रता वाले बम फेंके। उद्देश्य किसी को नुकसान पहुंचाना नहीं, बल्कि विरोध दर्ज कराना था। बम फेंकने के बाद पर्चे उड़ाए गए और "इंकलाब जिंदाबाद!", "साम्राज्यवाद का नाश हो!" तथा "दुनिया के मजदूरों एक हो!" के नारे लगाए गए। दोनों ने भागे बिना अपनी गिरफ्तारी दी।

5. जेल जीवन, 63 दिनों की भूख हड़ताल और शहादत

जेल में भूख हड़ताल (14 जून 1929 से)

लाहौर जेल में भारतीय और यूरोपीय कैदियों के बीच भेदभाव के विरोध में भगत सिंह और जतिन दास के नेतृत्व में भूख हड़ताल शुरू हुई। उनकी मांग थी कि भारतीय बंदियों को 'राजनीतिक कैदी' का दर्जा दिया जाए, बेहतर भोजन और पढ़ने के लिए पुस्तकें-अखबार दिए जाएं।

इस भूख हड़ताल के 63वें दिन (13 सितंबर 1929) को क्रांतिकारी जतिन नाथ दास शहीद हो गए। अंततः अंग्रेजी सरकार को कैदियों की मांगें स्वीकार करनी पड़ीं।

नियत समय से 11 घंटे पहले फांसी

विशेष ट्रिब्यूनल ने 'लाहौर षड्यंत्र केस' में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को मौत की सजा सुनाई। फांसी की आधिकारिक तारीख 24 मार्च 1931 तय की गई थी। हालांकि, जन-आक्रोश और विद्रोह के भय से ब्रिटिश प्रशासन ने नियम ताक पर रखकर नियत समय से 11 घंटे पहले 23 मार्च 1931 की शाम 7:33 बजे लाहौर सेंट्रल जेल में तीनों वीरों को फांसी दे दी।

रात के अंधेरे में शवों को फिरोजपुर के पास सतलुज नदी के तट (हुसैनीवाला) पर ले जाकर जलाने का प्रयास किया गया, लेकिन ग्रामीणों के एकत्र होने पर अंग्रेज अधिकारी अवशेष छोड़कर भाग गए।

6. वैचारिक विरासत और 119वीं जयंती पर प्रासंगिकता

भगत सिंह केवल एक सेनानी नहीं, बल्कि लेखक और पत्रकार भी थे। उन्होंने 'कीर्ति', 'प्रताप' और 'वीर अर्जुन' जैसे पत्रों में 'बलवंत', 'रंजीत' और 'विद्रोही' नामों से दर्जनों लेख लिखे।

  • "मैं नास्तिक क्यों हूं?" (अक्टूबर 1930): जेल में रचित यह निबंध उनकी वैज्ञानिक सोच, तर्कशीलता और मानवतावादी दर्शन का प्रमाण है।
  • सामाजिक-आर्थिक न्याय: उनका मानना था कि "यदि गोरे साहबों की जगह काले साहब गद्दी पर बैठ जाएं और शोषण का चक्र चलता रहे, तो ऐसी आजादी का कोई अर्थ नहीं है।"

उनकी 119वीं जयंती पर भगत सिंह का धर्मनिरपेक्ष दृष्टिकोण, सांप्रदायिकता के खिलाफ संदेश, वैज्ञानिक सोच और सामाजिक न्याय का विचार 21वीं सदी के आधुनिक भारत के निर्माण में सबसे महत्वपूर्ण मार्गदर्शन प्रदान करता है।

"शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा।"

A K

Founding Editor

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