नोएडा की जिलाधिकारी (DM) मेधा रूपम से जुड़े राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) मामले में सुप्रीम कोर्ट में हुई याचिका की लिस्टिंग को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। 'लॉयर्स एसोसिएशन फॉर कॉन्स्टिट्यूशन' (LAFC) ने भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत को एक खुला पत्र भेजकर इस मामले में अपना विरोध दर्ज कराया है। वकीलों के संगठन ने आरोप लगाया है कि मौजूदा रोस्टर नियमों को दरकिनार करते हुए नोएडा डीएम की याचिका को एक "विशेष पीठ" के समक्ष सूचीबद्ध किया गया, जो कि न्याय प्रणाली की स्थापित प्रक्रिया के विपरीत है।



संगठन का कहना है कि किसी मामले को रोस्टर से अलग हटाकर विशेष प्राथमिकता देना गलत नजीर पेश करता है और इससे आम जनता का न्यायिक प्रक्रिया पर भरोसा प्रभावित होता है।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के इसी फैसले और टिप्पणियों को चुनौती देते हुए नोएडा डीएम मेधा रूपम ने सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया था। इसी याचिका की सुप्रीम कोर्ट में लिस्टिंग की प्रक्रिया को लेकर अब सवाल खड़े किए जा रहे हैं।
क्या है पूरा मामला और क्यों हुआ विवाद?
यह पूरा विवाद नोएडा में श्रमिकों के विरोध प्रदर्शन के दौरान एक छात्र पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत कार्रवाई करने से जुड़ा हुआ है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) ने इस मामले में सख्त रुख अपनाते हुए नोएडा डीएम मेधा रूपम की खिंचाई की थी और छात्र को हिरासत में लेने के आदेश की कड़ी आलोचना की थी। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में डीएम को पीड़ित छात्र को 5 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश भी दिया था।इलाहाबाद उच्च न्यायालय के इसी फैसले और टिप्पणियों को चुनौती देते हुए नोएडा डीएम मेधा रूपम ने सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया था। इसी याचिका की सुप्रीम कोर्ट में लिस्टिंग की प्रक्रिया को लेकर अब सवाल खड़े किए जा रहे हैं।
वीआईपी ट्रीटमेंट का आरोप, मुख्य चुनाव आयुक्त की बेटी होने का भी जिक्र
लॉयर्स एसोसिएशन फॉर कॉन्स्टिट्यूशन ने चीफ जस्टिस को लिखे पत्र में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया है कि याचिकाकर्ता मेधा रूपम एक लोक सेवक होने के साथ-साथ भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त (Chief Election Commissioner) की बेटी भी हैं।
संगठन ने आरोप लगाया है कि याचिकाकर्ता के उच्च पदस्थ पारिवारिक पृष्ठभूमि के कारण मामले को प्राथमिकता और विशेष तरजीह (Preferential Treatment) दी गई लगती है। पत्र में लिखा गया है कि सुप्रीम कोर्ट के तय रोस्टर के अनुसार एनएसए (NSA) और कस्टडी से जुड़े मामले जिस पीठ के पास जाने चाहिए थे, वहां न जाकर इसे विशेष रूप से दूसरी पीठ को सौंपा गया। इस तरह की "आउट ऑफ टर्न" लिस्टिंग से न्यायिक निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं।
लेकिन इस महत्वपूर्ण और सार्वजनिक हित से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग सुविधा को म्यूट कर दिया गया। संगठन ने कहा कि यह मामला एक छात्र पर एनएसए लगाने और नागरिक अधिकारों से जुड़ा हुआ है, ऐसे में लाइव कार्यवाही की आवाज बंद (Muting) करने से पारदर्शिता पर असर पड़ता है और यह बेहद चिंताजनक है।
अब देखना यह होगा कि वकीलों के संगठन द्वारा उठाए गए इन गंभीर सवालों पर सुप्रीम कोर्ट प्रशासन और मुख्य न्यायाधीश की ओर से क्या रुख अपनाया जाता है।
वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग म्यूट करने पर भी जताई गई आपत्ति
पत्र में केवल केस की लिस्टिंग ही नहीं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान अपनाई गई प्रक्रिया पर भी आपत्ति व्यक्त की गई है। संगठन का कहना है कि अदालती कार्यवाही जनता और मीडिया के देखने के लिए सार्वजनिक होती है, जिसे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए आसानी से देखा जा सकता है।लेकिन इस महत्वपूर्ण और सार्वजनिक हित से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग सुविधा को म्यूट कर दिया गया। संगठन ने कहा कि यह मामला एक छात्र पर एनएसए लगाने और नागरिक अधिकारों से जुड़ा हुआ है, ऐसे में लाइव कार्यवाही की आवाज बंद (Muting) करने से पारदर्शिता पर असर पड़ता है और यह बेहद चिंताजनक है।
न्यायिक प्रक्रिया की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने की मांग
लॉयर्स एसोसिएशन फॉर कॉन्स्टिट्यूशन (LAFC) ने सीजएआई सूर्यकांत से अनुरोध किया है कि अदालती प्रक्रियाओं की शुचिता, पारदर्शिता और जनता का भरोसा बनाए रखने के लिए नियमों का सख्ती से पालन होना चाहिए। संगठन ने साफ किया कि अगर प्रक्रियागत नियमों को दरकिनार कर विशेष मामलों को तरजीह दी जाएगी, तो इससे न्यायपालिका की छवि को धक्का पहुंचेगा।अब देखना यह होगा कि वकीलों के संगठन द्वारा उठाए गए इन गंभीर सवालों पर सुप्रीम कोर्ट प्रशासन और मुख्य न्यायाधीश की ओर से क्या रुख अपनाया जाता है।
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