
जेल से छूटे श्रमिकों ने बयां किया दर्द: 'अमानवीय परिस्थितियों में काम करने को मजबूर'
कन्वेंशन के दौरान उन श्रमिकों ने अपने अनुभव साझा किए, जिन्हें हाल ही में मजदूर आंदोलनों में शामिल होने के कारण गिरफ्तारी और दमन का सामना करना पड़ा था।- विवेक (मानेसर के श्रमिक): उन्होंने बताया कि वह डेढ़ महीने से अधिक समय तक जेल में बंद रहे। विवेक ने औद्योगिक इकाइयों में व्याप्त अमानवीय कामकाजी परिस्थितियों का जिक्र किया और कहा कि बुनियादी अधिकारों की मांग करने पर मजदूरों का 'आपराधिकरण' (Criminalization) किया जा रहा है।
- राजकुमार (मानेसर के श्रमिक): हाल ही में जमानत पर छूटे राजकुमार ने लंबी कार्य अवधि और बेहद कम वेतन का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि आवश्यक वस्तुओं की आसमान छूती कीमतों, मकान किराए और स्वास्थ्य देखभाल के खर्चों के बीच महज 10,000 रुपये के मासिक वेतन पर परिवार का भरण-पोषण करना पूरी तरह असंभव हो चुका है।

कानूनी दमन और ठेका प्रथा पर प्रहार
नोएडा में जेल में बंद कार्यकर्ताओं का केस लड़ रहीं अधिवक्ता कंवलप्रीत कौर ने इस बात पर प्रकाश डाला कि किस तरह 'ठेका प्रथा' (Contractualization) मजदूरों के अधिकारों को दबाने और उन्हें यूनियन बनाने से रोकने का एक मुख्य हथियार बन चुकी है। उन्होंने इस बात की कड़ी निंदा की कि श्रम कानूनों का खुलेआम उल्लंघन करने वाले नियोक्ताओं (मालिकों) को तो पूरी छूट मिली हुई है, जबकि अपने हक के लिए आवाज उठाने वाले मजदूरों और कार्यकर्ताओं पर गंभीर आपराधिक धाराएं थोप दी जाती हैं।देशव्यापी संघर्ष और न्यूनतम वेतन की मांग
कन्वेंशन को संबोधित करते हुए AICCTU के राष्ट्रीय महासचिव राजीव डिमरी ने कहा:मजदूर विरोधी श्रम संहिताओं (Labour Codes) के खिलाफ देशव्यापी हड़ताल और उसके बाद औद्योगिक क्षेत्रों में उभरा आक्रोश यह दर्शाता है कि मजदूर अब शोषण को चुपचाप सहन करने के मूड में नहीं हैं। भारतीय मजदूर वर्ग इस आधुनिक गुलामी और बुनियादी अधिकारों के हनन को अब और बर्दाश्त नहीं करेगा।कार्यक्रम का संचालन कर रहीं AICCTU की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सुचेता डे ने रेखांकित किया कि हरियाणा में हाल ही में न्यूनतम वेतन में जो संशोधन हुआ है, वह केवल मजदूरों के लंबे और निरंतर संघर्षों के कारण ही संभव हो पाया है। हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि संशोधित वेतन भी आज की महंगाई के दौर में पूरी तरह से अपर्याप्त है।
AICCTU की मुख्य मांग: सम्मानजनक जीवन स्तर के स्थापित मानकों के आधार पर मजदूरों का न्यूनतम वेतन कम से कम 42,000 रुपये प्रति माह तय किया जाए। इसके साथ ही सम्मानजनक वेतन और यूनियन बनाने की स्वतंत्रता मजदूर वर्ग की ऐसी मांगें हैं, जिन पर कोई समझौता नहीं किया जा सकता।
गंभीर धाराओं के तहत कार्रवाई की निंदा
कन्वेंशन में विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों में मजदूर आंदोलनों को कुचलने के लिए अपनाए जा रहे दमनकारी रवैये की तीखी आलोचना की गई। वक्ताओं ने बताया कि महज अपने हक की लड़ाई लड़ने के कारण श्रमिकों पर "हत्या के प्रयास" (Attempt to Murder) जैसी गंभीर आपराधिक धाराएं लगा दी गई हैं।मानेसर में ऐसे ही आरोपों के तहत 17 श्रमिकों को जेल भेज दिया गया था। ट्रेड यूनियनों के प्रयासों और कानूनी हस्तक्षेप के बाद इनमें से 12 श्रमिकों को जमानत मिल चुकी है, लेकिन कई श्रमिक और कार्यकर्ता अब भी जेलों में बंद हैं और मुकदमों का सामना कर रहे हैं।
कन्वेंशन के मुख्य प्रस्ताव और मांगें:
सम्मेलन के अंत में एक स्वर से निम्नलिखित मांगों को लेकर प्रस्ताव पारित किया गया:- मजदूरों के वेतन में तत्काल और सम्मानजनक वृद्धि की जाए।
- शांतिपूर्ण आंदोलनों पर पुलिसिया और प्रशासनिक दमन तुरंत बंद हो।
- मजदूरों और सामाजिक कार्यकर्ताओं पर दर्ज सभी झूठे मुकदमे वापस लिए जाएं।
- लोकतांत्रिक श्रमिक आंदोलनों में भाग लेने के कारण जेलों में बंद सभी लोगों को तुरंत और बिना शर्त रिहा किया जाए।
(नोट: यह रिपोर्ट ऐक्टू [AICCTU] के दिल्ली राज्य सचिव अभिषेक द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति पर आधारित है।)