नीति आयोग का बड़ा कदम: आयुर्वेद को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने के लिए जारी किया 'स्ट्रेटेजिक रोडमैप'

भारत की प्राचीन और समृद्ध चिकित्सा पद्धति 'आयुर्वेद' को अब वैश्विक स्तर पर एक नई और मजबूत पहचान मिलने जा रही है। नीति आयोग ने 2 जुलाई 2026 को "स्ट्रेटेजिक रोडमैप फॉर मेकिंग आयुर्वेद ग्लोबल" (Strategic Roadmap for Making Ayurveda Global) शीर्षक से एक व्यापक रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट का मुख्य उद्देश्य वैश्विक स्तर पर आयुर्वेद की वर्तमान स्थिति का सटीक आकलन करना और इसे दुनिया के कोने-कोने तक पहुँचाने के लिए एक चरणबद्ध और व्यावहारिक रोडमैप तैयार करना है। यह कदम भारत सरकार के "विकसित भारत @2047" के संकल्प को पूरा करने की दिशा में बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

नीति आयोग ने जारी किया आयुर्वेद को ग्लोबल बनाने का रोडमैप: विकसित भारत @2047 का लक्ष्य

यह ऐतिहासिक रिपोर्ट नीति आयोग के उपाध्यक्ष डॉ. अशोक कुमार लाहिड़ी द्वारा जारी की गई। इस खास अवसर पर उनके साथ नीति आयोग के सदस्य प्रो. (डॉ.) एम. श्रीनिवास और आयुष मंत्रालय के सचिव वैद्य राजेश कोटेचा भी उपस्थित थे। इसके अलावा कार्यक्रम में नीति आयोग, आयुष मंत्रालय, विदेश मंत्रालय (MEA), विभिन्न सरकारी व अनुसंधान संस्थानों और उद्योग संगठनों के वरिष्ठ अधिकारियों ने भी हिस्सा लिया, जो इस बात का प्रमाण है कि सरकार आयुर्वेद को लेकर कितनी गंभीर है।

आयुर्वेद का वैश्वीकरण क्यों है जरूरी?

इस अवसर पर अपने संबोधन में नीति आयोग के उपाध्यक्ष अशोक कुमार लाहिड़ी ने कहा कि आयुर्वेद का वैश्वीकरण भारत के लिए पारंपरिक चिकित्सा के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व हासिल करने का एक स्वर्णिम अवसर है। इससे न केवल देश को उल्लेखनीय आर्थिक लाभ प्राप्त होगा, बल्कि बड़े पैमाने पर रोजगार के नए अवसरों का सृजन भी होगा। इसके साथ ही आयुर्वेद उत्पादों और सेवाओं के निर्यात में भारी बढ़ोतरी होगी और वैश्विक स्तर पर भारत की सांस्कृतिक और ज्ञान-आधारित सॉफ्ट पावर को मजबूती मिलेगी। उन्होंने इस बात पर विशेष बल दिया कि इस बड़े लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सभी मंत्रालयों को एक समग्र दृष्टिकोण अपनाना होगा, ताकि निर्धारित समय-सीमा के भीतर इसका सफल क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जा सके।

दूसरी ओर, नीति आयोग के सदस्य प्रो. (डॉ.) एम. श्रीनिवास ने स्पष्ट किया कि आयुर्वेद के वैश्वीकरण का मतलब केवल इसके बाज़ार का विस्तार करना या निर्यात बढ़ाना नहीं है। इसका मूल उद्देश्य दुनिया भर के लोगों के स्वास्थ्य परिणामों में सुधार करना और उन्हें स्वस्थ, संतुलित और अधिक संतोषपूर्ण जीवन के लिए उपचार का एक साक्ष्य-आधारित अतिरिक्त विकल्प उपलब्ध कराना है। ऐसा करके भारत प्राचीन काल से चली आ रही "सर्वे भवन्तु सुखिनः" (अर्थात सभी सुखी और निरोगी रहें) की अपनी पवित्र भावना को वैश्विक पटल पर साकार कर रहा है।

आयुष मंत्रालय के सचिव वैद्य राजेश कोटेचा ने आयुर्वेद को वैश्विक स्तर पर स्वीकार्यता दिलाने के लिए मंत्रालय द्वारा उठाए गए प्रमुख कदमों तथा पिछले एक दशक में प्राप्त उल्लेखनीय उपलब्धियों पर प्रकाश डाला। उन्होंने भरोसा जताया कि इस रिपोर्ट में प्रस्तुत सिफारिशें मंत्रालय के वर्तमान प्रयासों को और अधिक सशक्त बनाएंगी तथा आयुर्वेद को विश्व स्तर पर मान्यता प्राप्त स्वास्थ्य सेवा प्रणाली के रूप में स्थापित करने के प्रयासों को नई गति प्रदान करेंगी। वहीं विदेश मंत्रालय के अपर सचिव श्री अक्विनो विमल ने भी भारत की अंतरराष्ट्रीय सहभागिताओं और वैश्विक साझेदारियों के माध्यम से आयुर्वेद के वैश्वीकरण को आगे बढ़ाने में हुई प्रगति के बारे में विस्तार से बताया।

कैसे तैयार हुई यह रिपोर्ट?

यह अध्ययन नीति आयोग के स्वास्थ्य प्रभाग द्वारा प्रसिद्ध वैश्विक कंसल्टेंसी फर्म प्राइसवाटरहाउसकूपर्स (PwC) के सहयोग से किया गया है। इसमें आयुर्वेद के वैश्वीकरण से संबंधित अवसरों और चुनौतियों की बारीकी से पहचान करने के लिए व्यापक हितधारक परामर्श, अंतरराष्ट्रीय मानकों का तुलनात्मक अध्ययन तथा साक्ष्य-आधारित विश्लेषण का उपयोग किया गया है, जिससे यह रिपोर्ट नीति-निर्माताओं के लिए बेहद सटीक बन जाती है।

नीति आयोग की 3-स्तंभीय (Three-Pillar) रणनीति

रिपोर्ट में आयुर्वेद को वैश्विक स्तर पर स्थापित करने के लिए एक बेहद मजबूत 'थ्री-पिलर फ्रेमवर्क' (Three-Pillar Framework) पेश किया गया है, जो इस प्रकार है:

1. उपलब्धता (Availability)

पहले स्तंभ के अंतर्गत वैश्विक स्तर पर काम करने के तरीकों और कार्यबल को तैयार करने पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा। इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप आयुर्वेद शिक्षा को सुधारा जाएगा ताकि दुनिया भर में इसकी विनिर्माण क्षमता और निर्यात को बढ़ाया जा सके। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनुसंधान एवं विकास (R&D) पर विशेष जोर दिया जाएगा ताकि विदेशी वैज्ञानिक भी इसे आसानी से समझ सकें।

2. स्वीकार्यता (Acceptability)

दूसरे स्तंभ का मुख्य उद्देश्य दुनिया भर के देशों में आयुर्वेद को कानूनी और चिकित्सा के रूप में मान्यता दिलाना है। इसके लिए अंतरराष्ट्रीय नियमों और दिशानिर्देशों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित किया जाएगा। शैक्षणिक और औद्योगिक स्तर पर अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ाया जाएगा। साथ ही, विदेशों में आयुर्वेद इलाज को स्वास्थ्य बीमा कवरेज (Insurance Coverage) दिलाने और वहां की स्थानीय आवश्यकताओं एवं सांस्कृतिक परिस्थितियों के अनुरूप इसे ढालने पर काम किया जाएगा।

3. प्रसार (Promotion)

तीसरे स्तंभ के तहत आयुर्वेद की रणनीतिक ब्रांडिंग की जाएगी ताकि वैश्विक स्तर पर इसकी पहचान मजबूत हो सके। इसके लिए अंतरराष्ट्रीय पहचान और प्रचार-प्रसार के कार्यक्रमों को तेज किया जाएगा। साथ ही भारत में 'मेडिकल वैल्यू टूरिज्म' (Medical Value Tourism) को बढ़ावा दिया जाएगा, जिससे विदेशी मरीज इलाज के लिए भारत आएं। इसके अलावा विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) जैसी वैश्विक संस्थाओं में आयुर्वेद की सक्रिय उपस्थिति सुनिश्चित की जाएगी।

विकसित भारत @2047 और 'एक पृथ्वी, एक स्वास्थ्य' का संकल्प

यह रिपोर्ट महज एक दस्तावेज नहीं है, बल्कि विकसित भारत @2047 की कल्पना के अनुरूप वर्ष 2047 तक के लिए एक चरणबद्ध रणनीति प्रस्तुत करती है। यह नीति-निर्माताओं, शोधकर्ताओं, उद्योग जगत के हितधारकों, आयुर्वेद विशेषज्ञों तथा अंतरराष्ट्रीय सहयोगी संस्थाओं सहित विभिन्न पक्षों के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ दस्तावेज़ के रूप में कार्य करेगी। इसका उद्देश्य साक्ष्य-आधारित नीति-निर्माण को प्रोत्साहित करना तथा समन्वित प्रयासों के माध्यम से पारंपरिक चिकित्सा के क्षेत्र में भारत की वैश्विक नेतृत्वकारी भूमिका को मजबूत करना है।

रिपोर्ट में वैश्विक स्तर पर आयुर्वेद की चिकित्सा पद्धति, अनुसंधान, शिक्षा, निर्यात, नियामक समन्वय तथा अंतरराष्ट्रीय सहयोग को मजबूत बनाने के लिए प्रमुख नीतिगत प्राथमिकताओं पर विशेष बल दिया गया है। यह रिपोर्ट "एक पृथ्वी, एक स्वास्थ्य" (One Earth, One Health) की भारत की व्यापक प्रतिबद्धता को भी प्रतिबिंबित करती है तथा अपनी समृद्ध ज्ञान-परंपराओं के माध्यम से वैश्विक स्वास्थ्य एवं कल्याण को बढ़ावा देने में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका को और अधिक मजबूत करती है।

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