भारत जीआई: देश के पारंपरिक हस्तशिल्प और जीआई प्रोडक्ट्स को मिलेगा वैश्विक मंच

भारत के कोने-कोने में छिपी कला, हस्तशिल्प और अनूठे क्षेत्रीय स्वादों को अब एक नया और विशाल आसमान मिलने जा रहा है। देश के पारंपरिक कारीगरों, बुनकरों और छोटे उत्पादकों के जीवन में बड़ा बदलाव लाने के उद्देश्य से सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (MSME) मंत्रालय और उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (DPIIT) ने एक बेहद महत्वपूर्ण समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। नई दिल्ली के वाणिज्य भवन में आयोजित इस कार्यक्रम में दोनों विभागों के शीर्ष अधिकारियों ने साझेदारी पर मुहर लगाई। इस ऐतिहासिक कदम का सबसे बड़ा आकर्षण 'भारत जीआई' बैनर की शुरुआत है, जो हमारे देश के भौगोलिक संकेत यानी जीआई (GI) उत्पादों को सीधे डिजिटल बाजार और अंतरराष्ट्रीय खरीदारों से जोड़ेगा।

भारत जीआई: MSME और DPIIT की नई पहल से जीआई प्रोडक्ट्स को मिलेगा ग्लोबल मार्केट
Image source: PIB

क्या है यह समझौता और क्यों है इतना खास?

अक्सर देखा गया है कि हमारे देश में किसी खास इलाके के उत्पाद को जीआई टैग तो मिल जाता है, जिससे उसकी कानूनी सुरक्षा तय हो जाती है, लेकिन सही बाजार और प्रचार-प्रसार न मिलने के कारण उसका आर्थिक लाभ कारीगरों तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाता। इसी कमी को दूर करने के लिए यह पहल की गई है। DPIIT जहां जीआई टैग देने और बौद्धिक संपदा की रक्षा करने का काम करता है, वहीं MSME मंत्रालय छोटे उद्योगों और कारीगरों को बिजनेस के गुर सिखाने और वित्तीय रूप से मजबूत बनाने का जिम्मा संभालता है। अब जब ये दोनों ताकतें एक साथ आ गई हैं, तो इसका सीधा फायदा हमारे गांव-देहात के उन कारीगरों को मिलेगा जो पीढ़ियों से बेहतरीन कलाकृतियां, कपड़े और खाने-पीने की खास चीजें बनाते आ रहे हैं।

'भारत जीआई' बैनर से बदलेगी स्थानीय कारीगरों की किस्मत

इस साझेदारी के तहत 'भारत जीआई' नाम से एक खास मंच तैयार किया जा रहा है। इसके जरिए जीआई टैग वाले सभी स्थानीय सामानों को डिजिटल वाणिज्य के लिए ओपन नेटवर्क (ONDC) और सरकारी ई-मार्केटप्लेस (GeM) जैसे बड़े डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर लाया जाएगा। इसका सीधा मतलब यह है कि अब बनारसी साड़ी, कांजीवरम सिल्क, दार्जिलिंग चाय, कश्मीरी केसर या फिर मैसूर चंदन जैसी अनूठी चीजें सीधे ऑनलाइन उपलब्ध होंगी। अब आम ग्राहक और सरकारी विभाग बिना किसी बिचौलिए के सीधे कारीगरों से ये सामान खरीद सकेंगे। इससे न केवल ग्राहकों को असली और शुद्ध जीआई प्रोडक्ट मिलेंगे, बल्कि कारीगरों को भी उनके हुनर की पूरी और सही कीमत मिलेगी।

'एक जिला एक उत्पाद' और 'वोकल फॉर लोकल' को मिलेगी नई उड़ान

यह पहल केंद्र सरकार के ड्रीम प्रोजेक्ट 'एक जिला एक उत्पाद' (ODOP) और 'वोकल फॉर लोकल' के संकल्प को नई ऊर्जा देने का काम करेगी। समझौते के तहत दोनों संस्थान मिलकर ऐसे कार्यक्रम बनाएंगे जिससे स्थानीय कारीगरों को अपने प्रॉडक्ट्स की क्वालिटी बेहतर करने, पैकेजिंग सुधारने और बिजनेस को आधुनिक बनाने का प्रशिक्षण दिया जा सके। इसके अलावा, देश और दुनिया भर में आयोजित होने वाले बड़े व्यापार मेलों, प्रदर्शनियों और क्रेता-विक्रेता बैठकों में विशेष 'जीआई पवेलियन' बनाए जाएंगे। इन पवेलियन के जरिए भारतीय कारीगर अंतरराष्ट्रीय खरीदारों के सामने अपने उत्पादों का प्रदर्शन कर सकेंगे, जिससे भारतीय जीआई प्रॉडक्ट्स का निर्यात बढ़ेगा।

आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक मजबूत कदम

यह साझेदारी केवल एक सरकारी समझौता भर नहीं है, बल्कि यह भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने का एक बड़ा खाका है। जब स्थानीय कारीगरों को उनके उत्पादों का सही बाजार और वैश्विक पहचान मिलेगी, तो इससे रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे और युवा पीढ़ी भी अपनी पारंपरिक कला को आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित होगी। कुल मिलाकर, 'भारत जीआई' की यह पहल भारत के समृद्ध सांस्कृतिक इतिहास और पारंपरिक कारीगरी को आधुनिक डिजिटल अर्थव्यवस्था से जोड़ने वाला एक मजबूत पुल साबित होगी, जो देश को 'आत्मनिर्भर भारत' बनाने के सपने को तेजी से सच करेगी।

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